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15 May 2025 · 2 min read

कहानी फुटपाथ की !

फुटपाथ केवल चलने के लिए है?
छोटी-मोटी दुकानें भी चलती रहती हैं,
आते जाते लोगों के मनोरंजन के लिए,
गरीब के बच्चों का पेट पालने के लिए।

यह साधारण सा दिखने वाला फुटपाथ,
कितने बच्चों में भरता है उल्लास।
जिन्हें मिलता नहीं खेल का मैदान,
उसे भी जगह यह दे देता है नादान।
इसे जरा भी नहीं होता स्वयं पर अभिमान,
सबको अपनाता है बिल्कुल एक समान।
लेकिन फिर भी लोग इसे घृणित समझते है !
वहां बैठे लोगों को सब तिरस्कृत ही करते है !

जो स्वयं कभी फुटपाथ का हिस्सा थे ,
वह भी आज उससे दूर खिसकते है !
अपने सगे संबंधियों को इसके विषय में,
बताने में झिझकते हैं !

फुटपाथ पर अपनी टोकरी सजाए,
गरीब बैठा ग्राहक की आस लगाए।

हां बेशक ! कुछ अमीर लोग आते हैं,
चुपके से एक दो कपड़े खरीद लेते है।
और ऐसे भागते हैं जैसे कोई चोर भागता है।
पता नहीं उनको भी किसका डर सताता है।।

फिर वे भी चुपके से जाकर,
उस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं,
जो फुटपाथ पर बैठे लोगों की,
हर वक्त ही भर्त्सना करते हैं।

चढ़ती धूप में, पेट की भूख में,
आंखों में सपना लिए बैठता है।
ग्राहकों के मुंह निहारता रहता है,
कि कोई उस से कुछ खरीद ले,
तो उसके घर में भी एक दिन का चूल्हा जले।

वह शिद्दत से अपने काम में लगा रहता है ,
अपने सामान के बिकने का इंतजार करता है।
किंतु कोई नहीं टिकता, कुछ देर भी फुटपाथ पर,
सबको डर है कि कोई देख न ले, उन्हें उस स्थान पर।

वह टोकरी सजाए इधर – उधर ताकता,
किंतु उसका एक भी सामान नहीं बिकता,
फिर घुटनों में सिर झुकाए वह सोचता रहता है,
सुबह से शाम हो जाती है,
वह सुध-बुध खोता जाता है !
तभी अंधेरे में कुछ लोग आते हैं,
उससे सारे कपड़े लेकर चले जाते हैं ।
बदले में कुछ वक्त का,
खाना दे जाते हैं !

दूसरे दिन सुबह जब वह सड़क से गुजरता है,
अपनी टोकरी के कपड़े को मॉल में,
रखे पुतलों पर देखता है,
वह खुश होता है, चलो कहीं तो,
उसके कपड़े आए काम !
किसी ने तो रखा,
उसका उचित मान।

किंतु कुछ देर बाद ही नजारा कुछ और था,
पुतले को देखने आया जनसमूह था।
लोग उसे देखने के लिए लाइन लगाते हैं,
छू-छूकर देखते हैं, खरीदने को आते हैं।

क्या बदला? फुटपाथ के कपड़ों की जगह ही तो बदली है।
कपड़ा भी वही है, लोग भी वही हैं,
सिर्फ जगह ही तो बदली है।
यह सच है या है कोई भ्रम ?
एक ही चीज का अलग-अलग है दंभ !
फुटपाथ पर रखे उस कपड़े को क्या पता था कि
उसके ना बिकने की वजह,
महज वह स्थान था !

इसलिए उदास होने की क्या है तत्परता ?
बस जगह बदल जाने की है आवश्यकता !

फुटपाथ में नहीं सीखा दिखावापन,
आज भी करता है वह बच्चों का मनोरंजन ।
आज भी बैठा है उसपर एक गरीब कोने में,
अपने दर्द को दफन कर सीने में,
सिर घुटनों में टिकाए,
बेहतर भविष्य की आस लगाए !

फुटपाथ की गरिमा को नमन 🙏

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