नवनिधि क्षणिकाएँ---
नवनिधि क्षणिकाएँ—
15/05/2025
विस्तार
मन विस्तार चाहता
होता है कुछ और ही
जो कभी सोचा नहीं।
आती हैं कई रूकावटें
मनवांछित प्रिय कार्य पर
विस्तार वहीं रूक जाता।
तुम प्रेरक विस्तार के
शायद तुमको पता नहीं
यही नाम तुम्हारा रखा।
प्रश्नचिन्ह तो आयेंगे
हर नयी सोच के साथ
विस्तार भय मत करना।
समष्टि का विस्तार
जिस भी शक्ति ने की होगी
क्या पता वो होगी कैसी।
अपरिमित विस्तार है
चहुंमुखी सौदर्य का
मैं भी कम सुंदर नहीं।
क्या जाने इस जीवन में
किन -किन दिशाओं पर
होगा कब तक मेरा विस्तार।
— डॉ. रामनाथ साहू “ननकी”
संस्थापक, छंदाचार्य, (बिलासा छंद महालय, छत्तीसगढ़)
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