Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
15 May 2025 · 1 min read

#हिंदी_ग़ज़ल

#हिंदी_ग़ज़ल
■ बोझिल रातें, दिन भारी हैं…!
【प्रणय प्रभात】
◆ बोझिल रातें, दिन भारी हैं।
फिर भी उस के आभारी हैं।।

◆ दुनिया के मेले में हम तुम।
सैलानी हैं, व्यापारी हैं।।

◆ पता नहीं कब साथ छोड़ दें,
अब साँसें भी, बेचारी हैं।।

◆ कब जीते हैं दिन रातों से?
कब दिन से रातें हारी हैं??

◆ कुछ पल राहत, बाक़ी आहत।
सब उम्मीदें, त्यौहारी हैं।।

◆ सड़कों पर है धुंध सरीखी,
सारी गलियां, अंधियारी हैं।।

◆ वो सब निकले कारोबारी।
मन समझा था व्यवहारी हैं।।

◆ तेरा, मेरा, इसका, उसका।
ये सब बातें, संसारी हैं।।
🗓️🗓️🗓️🗓️🗓️🗓️🗓️🗓️🗓️
■संपादक■
*न्यूज़ & व्यूज़ (मप्र)

Loading...