मनुज तन
मिला मनुज तन नहीं गँवाना
सँभल चलें पथ बड़े जतन से।
करें वही जो लगे मनुज हित
चलें सदा हम कड़े जतन से।।
लगे हुए हर समय यहाँ पर
बड़े यतन से धनिक बने हैं।
करें अहित भी जहाँ लगे हित
सभी जगह पर खड़े जतन से।।
कभी नहीं वह सुने दुखी की
पुकार खाली सदा रहा है ।
सदैव अपना विकास चाहें
नये रतन नित जुड़े जतन से ।।
लगे सभी बस इसी जुगत में
रहे भरा धन सदा सदन में।
करे सभी कुछ नहीं सही जो
बिगाड़ करते भिड़े जतन से।।
कहीं प्रकाशित रहे सदा घर।
मिली किसी को यहाँ निशा है।
लिए हुए सब चलें नियति निज
सदा इसी से लड़े जतन से ।।
विनाश पथ पर बढ़े सदा ही
बसा बसाया उजाड़ता वह।
विकास कैसा विनाश करके
रहे मगर वे अड़े जतन से ।।
निहाल होते फिरे मनुज कुछ।
निरख बिलखते दुखी जनों को।
रहे नहीं वे यही समझ हैं
मिले सभी फल पड़े जतन से।।
उजास भर दे सभी मन में
दिखा सभी को विकास का पथ।
खिले सभी मन कुसुम मनुज के
कदम खुशी के पड़े जतन से ।।
डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा”
दिल्ली