सेवा उन्नति द्वार
मातु पिता सेवा सदा,उन्नति का सत द्वार।
सर्व ग्रंथ वर्णित करें,जगत करे स्वीकार ।।
मातु पिता सेवा सदा,पूजन का इक रूप।
राम कृष्ण का मर्म यह,पालित करते भूप।।
मातु पिता के हाथ में,बालक जीवन साज।
सच्ची सेवा भाव से,सुफलित हो हर काज।।
सेवा के सत भाव से,कटते जीवन कष्ट।
शुभता आती पास में,संकट होते नष्ट।।
सेवा की सत भावना,ईश्वर का उपहार।
समझें जो भी सार यह,करे उचित व्यवहार।।
सेवा करना गाय की, सुंदर सबसे काज।
वेद ग्रंथ कहते यही, समझें हम यह राज।।
आज जगत से मिट रहा,सेवा का सत भाव।
लोभ दर्प के अस्त्र से,पाते हम सब घाव।।
डॉ ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम