*लघुकथा: "कस्तूरी की खोज"*
“कस्तूरी की खोज”
गाँव के एक छोटे से घर में, मिट्टी की दीवारों के बीच, एक लड़की थी — रावी। शांत, गहरी और थोड़ी अलग। वह ज़्यादा बोलती नहीं थी, न ही किसी प्रतियोगिता में आगे बढ़ने की जल्दी उसे थी। माँ अक्सर कहती,
“कुछ कर भी लेगी या ऐसे ही चुपचाप रहेगी?”
पिता की उम्मीदें उसके छोटे भाई से जुड़ी थीं, और रावी? वो तो बस किताबों में गुम रहती, कभी कविता लिखती, कभी पुराने कपड़ों से गुड़ियों के लिए पोशाक बनाती।
एक दिन स्कूल में “अपना परिचय दो” गतिविधि हुई। सबने अपने सपनों के बारे में बताया — डॉक्टर, इंजीनियर, आईपीएस…
रावी खड़ी हुई और बोली,
“मुझे खुशबू बनना है… ऐसी, जो किसी को दिखे नहीं, पर उसकी दुनिया बदल दे।”
कक्षा हँसी में डूब गई। पर वहाँ एक टीचर थी — हिमानी मैम — जिनकी आँखों में चमक थी। उन्होंने रावी को रोका नहीं, हौसला दिया।
वक़्त बीतता गया। रावी ने लेखन में अपना रास्ता ढूँढा। उसने समाज की अनसुनी आवाज़ों को कविता दी, दुख को उम्मीद का रंग दिया। उसकी पहली किताब का नाम था — “कस्तूरी की बेटियाँ”।
जब वो अपने गाँव लौटी, तो वही पिता, जिन्होंने कभी उसे नकारा समझा था, लोगों से गर्व से कह रहे थे,
“वो हमारी बेटी है… जिसकी लेखनी ने लोगों की ज़िंदगी बदल दी।”
रावी मुस्कुराई —
उसे कोई मंच नहीं चाहिए था, न तालियाँ।
उसे तो सिर्फ़ खुद की खुशबू से दूसरों का जीवन महकाना था।
क्योंकि वो जानती थी —
“ये कस्तूरी सी बेटियाँ… दुनिया से नहीं पूछती कि वो क्या बन सकती हैं,
वो खुद अपनी परिभाषा रचती हैं।”