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14 May 2025 · 3 min read

बोगनवेलिया

बोगनवेलिया Bougainvellea

ये एक कांटेदार रंग बिरंगा सजावटी पौधा है जो अपने चमकीले कागज के जैसे फूलों के लिए जाना जाता है, जो असल मे फूल नही होते बल्कि छोटे सफेद फूलों के लिए सुरक्षा कवच होते हैं। ठीक मुसेंडा पौधे Mussenda plant की तरह। बोगेनवेलिया की कई प्रजातियां होती है। ये पौधे के रुप मे, बेल की तरह और बोनसाई की तरह उगाया जा सकता है। बोगेनवेलिया को हल्की और अच्छी पानी निकासी वाली मिट्टी पसंद है। इसे पूरी धूप व मिट्टी पूरी तरह सूखी होने पर ही पानी चाहिए। फूलों के बाद पौधे की छंटाई एवं हर महीने डेढ़ महीने में फास्फोरस युक्त खाद डालते रहना चाहिए। पौधे के आकार के हिसाब से बड़े गमले का प्रयोग करना उचित रहता है। बोगेनवेलिया की ये संपूर्ण जानकारी मेरे कई वर्षो के अनुभव पर आधारित नही है। ये मेरी इस पौधे के प्रति जिज्ञासा और इसे अपने टैरेस गार्डेन मे दो बार के प्रयास के बावजूद न उगा पाने की कुंठा मे एकत्रित की गई जानकारी पर आधारित है।

गार्डेनिंग का शौक मुझे मेरी मां से मिला जो एक किसान परिवार की बेटी थीं। हालाकि जमीन पर और गमले मे उगाये गये पौधों की तरकीब मे काफी अंतर होता है इसीलिए जो जमीन पर पौधे उगाने की जानकारी रखते हैं उनके लिये गमले मे उगाना आसान हो जाता है। … तो मेरी मां तुलसी भक्त थीं, तुलसी के गमले के श्रंगार के लिए अगल-बगल खुशबूदार फूलों के पौधे लगातीं थी, जो देखने में सुन्दर तो लगता ही साथ ही वातावरण भी सुगंधित रहता था। उनके सामने ही गार्डेनिंग में उनके साथ लगा रहता था, उनके न रहने के बाद मेरे रिटायर्मेंट के समय तक टैरेस पर कुछ पौधों से बढ़कर सीढ़ियों से लेकर छत तक अच्छा खासा गार्डेन बन गया था। मेरे शौक और रुचि को देखते हुए मेरे बच्चों मे भी उत्सुकता जागी और वो भी इसमें इंटरेस्टेड हुए, सबसे छोटी बेटी जो अब तक डिग्री कालेज में पढ़ाने लगी थी, को जब भी मौका मिलता कोई न कोई पौधा लाती और गमले मे लगाती। गार्डेनिंग का ये शौक मेरे सभी बच्चों को भी भा गया और ये सभी अपनी-अपनी तरह इसमे लग गये, जिस से मुझे अत्यंत खुशी हुई।

आजकल अपनी बड़ी बेटी के घर नई दिल्ली मे कुछ दिनो के प्रवास पर हूं। मेरी चार संताने है लेकिन मेरी इस बेटी का दिल बहुत बड़ा है, सेवा भाव और अपनत्व देखकर ऐसा लगता है कि मेरी गार्जियन है मेरे स्वर्गीय माता-पिता की आत्मायें इसमे समाई हैं, बिन कहे ही मन की बात समझने का हुनर इसमें कमाल का है। पिता अपनी संतान की स्वयं प्रसंशा नही करता लेकिन कोई पिता अपने आप को कब तक रोक पायेगा जब संतान इसके जैसी हो। मेरे दामाद जी केंद्रीय सरकार मे डिफेंस एकाउंटस मे अधिकारी हैं, लगभग 5 साल पहले इनका ट्रांसफर मुंबई से यहां हुआ था। बेटी यहां नई दिल्ली में पहला पौधा तुलसी का जो गमले मे कोकोपीट मे उगाया गया था, माल से खरीद के लाई थी। इस तरह यहां शुरुआत हुई। जब भी वो कानपुर अपने मायके आती तो हर दिन मेरे साथ टैरेस गार्डेन मे कुछ समय जरूर बिताती। बागवानी के कामों मे हाथ बटाती, पौधों के प्रकार उनके नाम रख रखाव वगैरह के बारे में चर्चा करती। मुझे अच्छा लगता और खुशी होती थी, कई पौधे, खाद-मिट्टी आदि दिये ताकि वह अपने यहां इस शौक को पूरा कर सके। दैवयोग से मेरा उसके यहां दिल्ली मे आना-जाना शुरू हुआ। जब भी जाता नये पौधे नये गमलों मे लगाता। दामाद जी भी सहयोग करते, खाद मिट्टी गमले वगैरह लाकर देते। चूंकि उनके यहां आगे पीछे दो बालकनी हैं जिनमें काफी स्पेश है तो बालकनी गार्डेन के कॉन्सेप्ट पर काम किया गया, जो अब निहायत खूबसूरत हो गया है, इतना कि देखने वाले खुद को प्रसंशा करने से रोक नही पाते।…तो इस प्रवास मे भी इसके लिए नये पौधों की तलाश के दौरान थूजा (मोरपंखी), गुड़हल के साथ बोगेनवेलिया भी मिल गया। मेरी तो बांझे खिल गयीं, मन खुशी से फूल के कुप्पा हो गया, ऐसा लगा कि भगवान ने मेरी सुन ली, मन की मुराद पूरी हो गई। बोगनवेलिया के पौधे को लगाते समय आंखे नम थी जिसे मै अपने टैरेस गार्डेन में न उगा सका, उसे बेटी की बालकनी गार्डेन मे लगा दिया।

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