"कुछ शब्द"
मन की अलमारी में बंद ‘कुछ शब्द’,मगर नि-शब्द पड़े हैं।
विचलित, बेचैन और सकुचाये,कोई न भाषा इनकी समझ पाएं।।
उठ उठ भाजे द्वार न खोले, लिपट के हृदय से मतवाले डोले।
रख दे कोई हाथ का मरहम,लिपट के फिर वह उनसे रोले।।
समझाएं और उन्हें बतलाएं, निकलो बाहर सब कुछ कह डाले।
पागल वो मुस्कान कर बोले,हड़कम्प मचेगा कैसे अपनी जुबान हम खोलें।।
सोने दो मत छेड़ो हमको, बहुत तंग है हमारे शब्दों के इरादे।
मर्यादा शायद भूल यह जाए,जब यह मन का गुब्बार निकाले।।
नादान है लेकिन सब है सच्चे, कह उठेंगे फिर चूक न खाएं।
कर देंगे शर्मिंदा लोगों को,सो रहने दो कुंठित बन जाए।।
उठे भूचाल जब हृदय में,कुछ शब्द तब आपस में ही लड़ जाए।
चीख़-चीख़ कर आत्मा को जगाए,तुम जैसे हम ना हो पाए।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”