आलोक आशा का
कुछ हलचल सी रहती है दिल में अक्सर
जैसे कोई पुकार रहा है धकेल रहा है मुझे…
जाने को उन रास्तों पर जिनकी नही जरूरत
सब कहते हैं तुम हो व्याकुल किस दर्द से ?
उलाहना देते हैं क्यों नही खुश सब पाकर भी ?
पर क्या कहूं
दिल आईना है मेरा न जाने किन चिर परिचितों का
उनको अपरिचित कहूं तो कैसे
जिनके अश्रु मेरे पूरे व्यक्तित्व को भिगो जाते हैं
लाचारियां अज्ञानता की,
कर्कशता युद्धों की,
बेबसी भूख की,
दर्द निर्वासितों का
और न जाने क्या क्या
सबकी हलचल होती है मुझमे
चाहें कितना थामने की कोशिश करूं खुद को
पर सत्य यही है
विचलन होता है मुझमें
सब देखकर ।
जब देखती हूँ किसी पूजन स्थल को भी
जमीदोंज होते अन्य इमारतों के साथ
प्राकृतिक आपदा में
या मानवीय इच्छा से
तब लगता है हमारा अन्तस ही उसका
सच्चा निवास है
जो अनेकों सुनामियों के बावजूद
अनके विपत्तियों से गुजरने के बाद
बचा रहता है
फिर उम्मीद लिये सृजन की
हर अंधियारे से निकलता है
आशा का आलोक ले
और दिल चाहता है
ये आलोक फैले हर दिशा , हर ओर ।
कविता मधुर