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13 May 2025 · 1 min read

खेल नहीं होती औरत

खेल नहीं होती औरत,
समाया है उसमें पूरा ब्रह्मांड
जननी है वो सबसे पहले
कितने किरदार निभाती है वो
मकान को घर बनाती है
अन्नपूर्णा बन कर खिलाती है।
कभी मां,कभी बहन
कभी जीवन संगिनी।
फिर भी वो सुरक्षित नही
मर्द को पैदा करती , मर्द ही उसे
धिक्कारता ,लूटता
नहीं देता सम्मान
दुर्गा बन जब वो महिषासुर को मारेगी
क्योंकि खेल नहीं होती औरत
सुरिंदर कौर

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