रोशनी के लिये
आओ खोले मन की खिड़कियां फिर
रोशनी के लिये
जिससे हटे अंधकार का साम्राज्य
जो स्थायी सा समझ खुद को
जम गया है हर चीज पर ।
शुरू करें संवाद
जिसकी गर्मी से पिंघल सके
रिश्तों पर जमी बर्फ
देख सके इक दूजे की आंखो में
पढ सकें दिल पर लिखे शब्द ।
पढें प्रकृति से पाठ
जो देती है
सबकुछ निस्वार्थ
चलें मिल सब साथ
बेहतर करने इस प्यारी दुनिया को ।
कविता मधुर