*झगड़े की मध्यस्थता का सुख (हास्य व्यंग्य)*
झगड़े की मध्यस्थता का सुख (हास्य व्यंग्य)
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किसी झगड़े में मध्यस्थ बनने का जो सुख होता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। झगड़ा देखना ही अपने आप में एक सुखद कार्य होता है। बढ़िया वाला झगड़ा प्रायः कम ही देखने में आता है। थोड़ी-बहुत नोंक-झोंक को हम झगड़ा नहीं कह सकते। बढ़िया झगड़ा वह होता है जिसमें दो लोग लड़ते हैं और तमाशा देखने वालों की भीड़ चारों तरफ इकट्ठा हो जाती है। घरों के भीतर झगड़ा तब माना जाता है, जब उस झगड़े की आवाज घर के बाहर सड़क पर सुनाई दे।
झगड़ा किसी भी रूप में हो, वह दर्शनीय होता है। काफी लोग झगड़े की मध्यस्थता करने के लिए आगे बढ़ते हैं। लेकिन सही ढंग से मध्यस्थता तब होती है, जब दोनों पक्षों के लोग किसी व्यक्ति को मध्यस्थ बनाते हैं। जैसे ही व्यक्ति किसी झगड़े में मध्यस्थ बनता है, उसकी दसों उंगलियॉं घी में डूब जाती हैं ।अर्थात वह परम सुख को प्राप्त हो जाता है। अब उसका प्रतिदिन का कार्य मध्यस्थता करना ही रह जाता है। दोपहर का भोजन एक झगड़ालू के घर पर तथा रात का भोजन दूसरे झगड़ालू के घर पर ग्रहण करना उसकी दिनचर्या होती है। दोनों जगह पर वह चाय-नाश्ता अर्थात रसगुल्ला और समोसा खाता है। अपनी बहुमूल्य राय देता है और झगड़ा निपटाने के लिए प्रयास करता हुआ दिखाई पड़ता है।
मध्यस्थ की होशियारी इसी में है कि झगड़ा स्थाई रूप से समाप्त नहीं हो। होशियारी यह भी है कि दिल से वह झगड़ा समाप्त न करने के लिए प्रयत्नशील होने पर भी बाहर से झगड़ा समाप्त करने के लिए जी-जान से प्रयत्न करता हुआ दिखाई दे।
बहुत से घरों में जो हम सास और बहू के झगड़े तू-तू मैं-मैं के स्तर तक पहुंचते हुए देखते हैं, इसका श्रेय मध्यस्थों को ही दिया जाना चाहिए। पति-पत्नी के विवादों को मध्यस्थ तलाक तक पहुंचा कर ही दम लेते हैं। बात का बतंगड़ बनाना मध्यस्थों के बाएं हाथ का खेल होता है।
जीवन में मध्यस्थ बनना बड़े गौरव की बात होती है। कई लोगों की पूरी जिंदगी निबट जाती है लेकिन वह मध्यस्थ नहीं बन पाते। मोहल्ले की शांति समिति में स्थान पाने के लिए लोग जुगाड़ लगाते रहते हैं।
काफी लोगों का मानना है कि बाकायदा मध्यस्थ बनने का निमंत्रण किसी के पास नहीं आता। कुछ चालाकी और जुगाड़ करके मध्यस्थ का पद प्राप्त करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर अगर शादी-ब्याह के मामले में एक पक्ष ने किसी से लड़के या लड़की के बारे में इन्क्वायरी (जानकारी) ले ली और उस जानकारी के संदर्भ में वह व्यक्ति दूसरे पक्ष के पास तक पहुंच गए तो समझ लो वह अपने आप को इस गरिमामय स्थिति में लाकर खड़ा कर सकते हैं कि घोषणा कर सकें कि शादी मेरी मध्यस्थता से हुई है ।
आजकल मध्यस्थ बनने के इच्छुक व्यक्तियों से बहुत सतर्क रहने की जरूरत है। वे तो शांति पुरस्कारों के चक्कर में मध्यस्थ बनना ही चाहेंगे। लेकिन यह हमारा दायित्व है कि हम उन्हें अपने झगड़ों से दूर रखें अन्यथा हमारा झगड़ा भले ही निबट जाए लेकिन यह मध्यस्थ हमारा पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं।
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लेखक: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
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