तगाफुल 2025
1
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212212
क्या कहूँ दोस्तों मैं की क्या है गज़ल
जान लो शायरी की शमा है गज़ल ।
यूँ तो है आशिकों की रज़ा ये गज़ल
माज़ी से शायरों की सदा है गज़ल ।
दाग,मिर्ज़ा,वली मीर,कैफो ज़फर
काजमी जौन ,खुसरो ,निदा है गज़ल ।
कैफी, इक़बाल दुष्यंत ,फैज़ो अदम
हाल के दौर की भी जुबां है गज़ल।
आशिकों के लबों पे है सजती बड़ी
देखिये हुस्न की भी अदा है गज़ल ।
दिल जलो के लिए है अगर आसरा
माशुका के लिए भी दुआ है गज़ल ।
देखिए टूटे दिल की है उम्मीद भी
दर्दे दिल के लिए भी जफ़ा है गज़ल ।
है अजय यार तेरे ये वश की नहीं
तेरी खातिर तो बस इक बला है गज़ल
-अजय प्रसाद
2
मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122122122122
तवज्जो के बदले तगाफुल मिला है
मुहब्बत ने मुझ पर सितम ये किया है।
क़दर मेरी अब तक किसी ने न जानी
ज़माने से मुझको यही बस गिला है ।
मुसलसल लड़ा हूँ मैं दुश्वारियों से
मुझे आफतों ने ही शैदा किया है
बड़ी ही अनोखी है अपनी कहानी
फक़त हादसों का ये इक दास्ताँ है ।
न कोई सफर है न कोई डगर है
खुदा जाने कैसा मेरा काफ़िला है।
है फूलों को उल्फत मेरी मायुसी से
खफ़ा है चमन भी बहारें जुदा हैं ।
खता क्या है मेरी ज़रा तो बता दे
खुदा से मेरी बस यही इल्तिज़ा है
फ़साना भला मैं किसे अब सुनाऊँ
अलग मेरा मौज़ू अलग दास्ताँ है ।
है गर्दिश में तारे अज़ल से हमारे
किसे है पता क्या मेरा माजरा है ।
भला क्या करूँ मैं अजय तू बता दे
मेरी बंदगी से खुदा ही खफ़ा है
शैदा = attracted
3
मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122122122122
जो मुझसे खुशी की गज़ल मांगते हैं
वो बंजर ज़मीं से फसल मांगते हैं।
बुलंदी तो छूना सभी चाहते हैं
मगर रास्ता भी सरल मांगतें हैं ।
जमाने से यारों जो सूखी पड़ी है
उसी झील से वो कमल मांगते हैं ।
खफ़ा हैं वो खुद ज़िन्दगी से ही शायद
जवानी में जो भी अज़ल मांगते हैं
कभी टूट कर जो बिखरते नहीं है
अजय वो इरादे अटल मांगते हैं
-अजय प्रसाद
4
ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
फ़ाएलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122121222
जिंदगी क्या है जान जाओगे
मौत को जब करीब पाओगे..
आँख अपनी कभी नहीं सोई
तुम इसे ख्वाब क्या दिखाओगे..
दोस्ती क्या है, दुश्मनी क्या है
करके देखो तो जान जाओगे..
दिल तो पहले ही खाक़ है मेरा
यार क्या बिजलियां गिराओगे..
मुझको आता नही है खत लिखना
हाल चेहरे से जान जाओगे..
-अजय प्रसाद
5
रमल मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
21222122212
कत्ल कर के मेरा कातिल रो पड़ा
कर सका जब कुछ न हासिल,रो पड़ा ।
था समन्दर खुश डुबो कर के मुझें
अपनी लाचारी पे साहिल रो पड़ा ।
आया था तो वो दिखाने पैतरा
सादगी पे मेरी कामिल रो पड़ा।
जो बने फिरते हैं खुद में औलिया
हरकतों पे उन की जाहिल रो पड़ा ।
की मदद मज़दूर ने मजदूर की
अपनी खुदगर्जी पे काबिल रो पड़ा ।
जा रही थी अर्थी मेरे प्यार की
हो के मैयत में मैं शामिल रो पड़ा ।
बिक गया पैसों की खातिर फैसला
बेबसी पे अपनी आदिल रो पड़ा
-अजय प्रसाद
6
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212212
चार दिन चांदनी फिर वही रात है
आजकल इश्क़ में ऐसा ही हाल है ।
पानी के बुलबुले जैसी है आशिकी
अब न मजनू है कोई ,न फरहाद है ।
हुस्न में भी वो तासीर अब है कहाँ
वो न लैला न शीरी की हमजाद है ।
रह गयी है बदन तक सिमट कर वफ़ा
खोखलेपन से लबरेज़ ज़ज्बात है ।
माशुका में न वो नाज़ुकी ही रही
आशिकों में कहाँ यार वो बात है
इश्क़ में इस कदर है चलन आजकल
रोज जैसे बदलते वो पोशाक है
मतलबी इश्क़ है मतलबी आशिकी
प्यार तो अब अजय सिर्फ़ इक प्यास है ।
-अजय प्रसाद
7
फ़ाएलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122121222
जाने वो लम्हा कैसे आएगा
जब कुआँ प्यासे को पिलाएगा ।
झाँक ले अपने मन के अन्दर भी
खोखला खुद को ही तू पाएगा ।
कब्र को है यकीन जाने क्यों
लाश खुद से ही चल के आएगा ।
थूकना आसमा पे मत वर्ना
तेरे चेह्रे पे ही वो आएगा ।
लाख कर ले वफ़ा मुहब्बत में
बेवफ़ा फ़िर भी समझा जाएगा ।
वक्त के साथ ज़ख्म मेंरा भी
देखना यारों भर ही जाएगा
रख अजय तू खुदा से उम्मीदें
रहम तुझ पर भी वो दिखाएगा ।
-अजय प्रसाद
8
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212212
ख्वाहिशें मेरे दिल में जगा देतें हैं
देखके मुझको वो मुस्कुरा देतें हैं ।
दिल बहल जाता है मेरा भी दोस्तों
मुझको दीवाना अपना बना देतें हैं ।
शाम हो जाती रंगी हैं मेरी बहुत
ज़ाम नज़रो से वो जब पिला देतें हैं ।
रात भर ख्वाब में उनसे बातें करी
चांद तारे भी मुझको दुआ देतें हैं ।
दिल में रक्खा है मैनें उन्हें इस तरह
जैसे फूलों में खुशबू छिपा देतें हैं।
उनकी महफिल में जब भी गए हम अजय
गज़लें मेरी ही वो गुन गुना देतें हैं
-अजय प्रसाद
9
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212212
हसरतें मेरी बस हाथ मलती रही
ज़िंदगी छाती पे मूँग दलती रही ।
मैं सितम उनके चुपचाप सहता रहा
खामुशी भी मेरी उनको खलती रही।
उनके महफिल में जो आज मौजूद था
रात भर ये शमा मुझसे जलती रही ।
होगी हम पे भी नजरें इनायत कभी
दिल में ख्वाहिश यही मेरी पलती रही ।
वक़्त ने तो दिया है दगा हर दफ़ा
ज़िन्दगी बेसबब यूँ ही ढलती रही।
-अजय प्रसाद
10
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212212212212
रोज़ यूँ खुद को ही आजमाता हूँ मैं
हाँ खफ़ा हो के भी मुस्कुराता हूँ मैं ।
मौत महफ़ूज है ज़िंदगी के तले
खुद को ही ये यकीं अब दिलाता हूँ मैं ।
जब से तुमने कहा मुझको अपना सनम
तेरे नेमत को दिल से लगा ता हूँ मैं।
अब खुदा से भी कोई शिक़ायत नहीं
अपना सर उसके दर पर झुकाता हूँ मैं ।
हो गई है हसीं ज़िंदगी यूँ अजय
आजकल आइने को भी भाता हूँ मैं
-अजय प्रसाद
11
:- ग़ज़ल
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुरब्बा महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन
2222
है ईश्क़ गर
तो तू ज़िक्र कर ।
प्यार से इधर
देखा तू कर ।
ख्वाबों में आ
फ़िर तू रात भर ।
दिल में आ समा
आँखों के दर।
चाहत रहे गर
तेरी उम्र भर ।
तो ज़िंदगी ये
जाएगी गुजर।
नज़रे क रम
होगा जो इधर ।
तो होगा अजय
आसान सफ़र ।
-अजय प्रसाद
12
मतदारक मुरब्बा सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212
उम्रभर दर ब दर
ज़िंदगी बेखबर ।
मंजिलें हैं जुदा
रास्ते हम सफर ।
मन्नते है खफ़ा
हर दुआ बेअसर ।
क्या पता क्या खता
चल रहा शूल पर ।
सच बता क्या हुआ
क्या मैं था भूल पर ।
जुर्म है इश्क़ भी
सोंच कर प्यार कर
हार सकता नहीं
है अजय, तू अगर ।
-अजय प्रसाद
13
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुरब्बा महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन
2222
जैसी नीयत
वैसी वरकत ।
छोड़ो नफ़रत
करो मुहब्बत ।
दिल तू मिला के
पा जा जन्नत ।
धर्म या मज़हब
बस है फितरत ।
आओ हम तुम
जोड़े रगवत ।
मिल के रहना
अपनी चाहत।
हम हैं जिंदा
उसकी रहमत ।
ज़िंदगी है क्या
खुदा की नेमत ।
तो फिर अजय तुम
कर लो उल्फत ।
-अजय प्रसाद
14
हज़ज मुरब्बा सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
12221222
मुझे नाकाम रहने दे
अभी गुमनाम रहने दे ।
भले नफरत से देखे वो
मुझे बदनाम रहने दे ।
मेरी तकलीफें तो खुश हैं
अभी आराम रहने दे ।
मुझे है पढ़ना आँखों में
तेरा पैगाम रहने दे ।
ज़रा जी लूँ मैं गफ़लत में
अभी तू ,जाम रहने दे ।
खुशी में तेरी, खुश हूँ मैं
मुझे बे-नाम रहने दे
अजय तू भूल जा सब कुछ
हसीं ये शाम रहने दे ।
-अजय प्रसाद
15
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुरब्बा महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन
2222
लम्हा गर हूँ
तो मुख्त्सर हूँ
इश्क़ से भी मैं
हाँ बे खबर हूँ ।
मामूली सा
मैं भी बशर हूँ
ठोकरों का ही
इक पत्थर हूँ ।
अब तक यारों
मैं दर ब दर हूँ ।
तू देख तो ले
मैं किस कदर हूँ ।
लेकिन अजय तो
मैं हार कर हूँ ।
-अजय प्रसाद
16
जदीद मुसद्दस सालिम
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन मुसतफ़इलुन
212221222212
चाहता जो हूँ मै वो ,कह पाया कहाँ
वो असर मेरे सुखन में ,आया कहाँ ।
आप कहतें हैं तो शायद ,उम्दा ही हो
मेरे माफिक मैं अभी लिख पाया कहाँ ।
सोई है जनता जो गफ़लत की नींद में
ठीक से अब तक जगा, मैं पाया कहाँ
सिर्फ़ तन को ही नहीं , मन भी दे हिला
वो तलातुम मैं अभी ला पाया कहाँ ।
है अभी बेहद कमी तुझमे भी अजय
वो वज़न शेरों में भी है आया कहाँ
-अजय प्रसाद
17
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212212
एक हसरत मेरी हाथ मलती रही
ज़िंदगी छाती पे मूँग दलती रही ।
मै सितम उनके चुपचाप सहता रहा
खामुशी भी उन्हे मेरी खलती रही ।
उनकी महफिल में जो आज मौजूद था
रात भर ये शमा मुझ से जलती रही ।
होगी नज़रे इनायत वो मुझ पर कभी
दिल मे ख्वाहिशें मेरी पलती रही
वक्त ने तो दगा है दिया हर दफ़ा
ज़िंदगी बेसबब यूँ ही ढलती रही ।
उम्र भर दोस्तों मैं तरसता रहा
वो मेरे सामने ही बदलती रही
साथ उम्मीद के जागा मैं रात भर
शाम आकर अजय रोज़ छलती रही
-अजय प्रसाद
18
फ़ाएलातुन मुफ़ाईलुन
21221222
दिल लगाने की बात न कर
इस जमाने की बात न कर ।
कौन कब धोखा दे दे यहाँ
दोस्ताने की बात न कर
मेरी किस्मत में है ही नही
घर बसाने की बात न कर ।
भूल जाते हैं लोग खुदा
आजमाने की बात न कर ।
तेरी महफिल में हम भी तो हैं
उठ के जाने की बात न कर ।
रौशनी गर पसंद नहीं
घर जलाने की बात न कर ।
रूठ कर मैं कहाँ जाऊँ
तू मनाने की बात न कर
-अजय प्रसाद
19
मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122122122122
जमाना है अक़्सर उन्हें भूल जाता
जो राहों में सब के है काँटे बिछाता ।
भलाई भी तो हद से ज्यादा बुरी है
जहाँ झोंक आँखों में है धूल जाता ।
दग़ा दोस्त ही जब करें दोस्ती में
है जीगर में चुभ तब कोई शूल जाता ।
न हो बाग पे गर नज़र बागवाँ की
उदासी में मुरझा है हर फूल जाता ।
अजय अब तू भी भूल जा ये शराफ़त
भले को है समझा यहाँ शूल जाता ।
-अजय प्रसाद
20
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22222222222
जिंदगी यूँ ही जज्बात से नहीं चलती
सिर्फ़ ऊंचे खयालात से नहीं चलती ।
रुखसत होता हूँ रोज घर से रोज़ी को
गृहस्थी चंदे या खैरात से नहीं चलती ।
उलझा रहता हूँ रोज़ घर की जरूरतों से
बस ख्वाब और एहससात से नहीं चलती ।
लाज़मी रूह की है मंजूरी मुहब्बत में
बस जिस्मों के मुलाकात से नहीं चलती ।
गाफिलों समझो कब्र की मौजूदगी को भी
ये दुनिया बस आबेहयात से नहीं चलती ।
-अजय प्रसाद
21
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212212
फूल चुभने लगे हर खुशी के मुझे
ख्वाब डसने लगे जिंदगी के मुझे ।
आ गई रास है मुझको नाकामियां
गीत अच्छे लगे बेबसी के मुझे ।
बन गया है अंधेरा मेरा हम सफर
छोड़ साथी गए रौशनी के मुझे ।
आ गया हूँ चमन से मैं वीराने में
रंग फीके लगे हर कली के मुझे।
चैन जब लूट मेरा गया दोस्तों
दर्द अच्छे लगे आदमी के मुझे
दिल जला,घर जला,जिंदगी जल गई
ये सिले हैं मिले आशिक़ी के मुझे ।
मेरे दुशमन तू अब दुश्मनी ही निभा
कोई तोहफे न दे दोस्ती के मुझे ।
-अजय प्रसाद
22
मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122122122122
ये कैसी हवा आज बहने लगी है
मुहब्बत भी अब यार छलने लगी है ।
जमाना मुझे छोड़ देगा अकेला
उसे मेरी गजलें जो खलने लगी है ।
कभी खुश मुझे देख सकती नहीं वो
मेरी जिन्दगी मुझसे जलने लगी है ।
गरीबी मुझे रास अब आ गयी है
वो नजरें करम हम पे करने लगी है ।
खफा हो गये हैं तेरे ख्वाब तुझसे
अजय तेरी रातें बदलने लगी हैं ।
-अजय प्रसाद
23
फ़ाएलातुन मुफ़ाईलुन
2122 1222
दर्द की इक इबारत लिख
है मुहब्बत तिज़ारत लिख ।
कोई रहता नहीं दिल में
ढह गयी है इमारत लिख ।
थी इनायत कभी नजरें
अब है इनमें हिकारत लिख ।
जो हैं कानून के रक्षक
कब हैं करते हिफाज़त लिख ।
खामुशी मेरी खलती है
वो हैं करते शिकायत लिख ।
अब अजय मान ले तू भी
खतरे में है शराफत लिख ।
-अजय प्रसाद
24
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22222222
दुश्मनों को जो पसंद बहुत है
अपने यहाँ जयचन्द बहुत है।
जो हैं अंधे ,बहरे औ गूँगे
आवाज़ उसकी बुलंद बहुत है ।
जिसने सीखा है सच छिपाना
समझो वो अक़्लमंद बहुत है
फ़ायदा मौके का है उठाता
जैसे ज़रूरतमंद बहुत है।
छोड़ दिया हमें हाल पे अपने
वैसे तो वो फिक्र मंद बहुत है ।
-अजय प्रसाद
25
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222
गम छूपा हँसता चल
खुद को ही छलता चल ।
राहें तो है मुशिकल
हिम्मत कर बढ़ता चल ।
रोना मत डर कर तू
आसूँ पी लड़ता चल।
कदमों में है मंजिल
उम्मीदें करता चल।
रौशन कर दिल का लौ
अंदर से जलता चल।
-अजय प्रसाद
26
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22222222
आधा इश्क़ और अधूरे ख्वाब
चाहत उसकी औ दिल बेताब ।
आँखे नम फ़िर से कर गयी आज
सूखे फूल और एक किताब ।
मेरी हालत और उस से प्यार
खिलता जैसे है काँटों में गुलाब।
दहशत में हो क्यों न ज़िन्दगी
ज़िंदा रहना ही जब हो अज़ाब ।
औकात अजय की जान लो तुम
फूटी कौड़ी भी नहीं है जनाब
-अजय प्रसाद
27
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212212
खुद से ही आज खुद लड़ रहा आदमी
अपनी ही जात से डर रहा आदमी
दौड़ते भागते सोते औ जागते
सपनो के ढेर पर सड़ रहा आदमी ।
इस कदर मतलबी बन गया आज वो
खुद के ही नज़रो में गड़ रहा आदमी ।
रात दिन खल रहा अपने ही आपको
अपनो के पीछे ही पड़ रहा आदमी ।
अब अजय इस जमाने की क्या बात हो
आदमी से जहाँ जल रहा आदमी
-अजय प्रसाद
28
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22222222
हम पर तरस न खाओ कोई
बस अब सज़ा सुनाओ कोई ।
धड़कन बंद हुई जाती है
गहरी चोट लगाओ कोई।
कब से कुछ भी कहा नहीं तुमने
फ़िर इल्जाम लगाओ कोई।
टूट रहे हैं हँसते हँसते
देकर खुशी रुलाओ कोई।
डूब रहें हैं खामोशी से
अब तूफान उठाओ कोइ।
-अजय प्रसाद
29
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
2222222222
सर अपना पत्थर पे मार रहा हूँ
खुद को ही रोज मैं सुधार रहा हूँ ।
हर पल मांग रहा वक्त साँस मेरी
यूँ कर्ज ज़िंदगी की उतार रहा हूँ ।
है मेरी शख्सियत भी अजीबोगरीब
औरों को फूल खुद से खार रहा हूँ ।
पढ़ लेता हर कोई है चेहरे से मुझको
जैसे सबके लिए अखबार रहा हूँ ।
मुसीबतें रहतीं मेरे साथ अक़सर
अजय मैं उनका शुक्रगुजार रहा हूँ
-अजय प्रसाद
30
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22222222222
अब देखें और जमाने से क्या मिलता है ?
जिल्लत ,नफरत दर्द या फिर दवा मिलता है ।
बुझने देतें नहीं नेता ही घृणा की आग
आपस में लड़ा कर ही इन्हे मज़ा मिलता है ।
आखिर इल्म करा ही दिया इश्क़ ने हमें
आशिक़ी में अक़्सर कम ही वफ़ा मिलता है ।
कैसे कह दूँ खुदा देर है अँधेर नहीं
अब कहाँ नेकियों का कोई सिला मिलता है
अरसा हो गया यारों मुझको मिले मुझसे
अब अजय आईना भी हमसे खफा मिलता है ।
-अजय प्रसाद
31
बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222222222
ज़ेहन में ज़हालत जैसे यारों समा गया है
बेतरतीब रहना ही अब लोगों को भा गया है।
बेमतलब की बाते औ फ़िज़ूल की जज़्बातें
दौर-ए-हाज़िर में पूरी तरहा से छा गया है
ये दौलत और शोहरत की लालच का क्या करें
नये दौर के नौजवाँ के कब्जे में आ गया है।
बेलगाम और बेतहाशा तकनीकी दौर के
चंगुल में न जाने कब से हर बशर आ गया है ।
क्या करेगा अजय अपनी बेबस तन्हाई का
तेरी परछाई भी तो तुझे ठुकरा गया है
–अजय प्रसाद
32
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुरब्बा मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
2222222
हादसों में ही मैं पला हूँ
खुद की खातिर ही बला हूँ
नूर यूँ ही नहीं है चेह्रे पे
हँस कर हर गम को छला हूँ
मन्नतें भी मुझ से खफ़ा हैं
दुआओं को भी मैं खला हूँ ।
छाछ भी हूँ फूँक कर पी ता
यारों मैं दुध का जला हूँ ।
बस है इक बुरी लत मुझमें
चाहता सबका मैं भला हूँ ।
-अजय प्रसाद
33
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222222222
साहिल पे बैठ के समंदर देख रहा हूँ
है कितना लाचार धुरंधर देख रहा हूँ।
बेजान ये नज़ारे लहरें और किनारे
बाहर नहीं मैं खुद के अंदर देख रहा हूँ ।
टकरा कर साहिल से लौट रही हैं लहरें
और मैं मायूस होके मंजर देख रहा हूँ।
हैं उनकी यादोँ के मन्ज़र अब भी आबाद
तन्हाइयों ने डाला है लंगर देख रहा हूँ ।
बेहद खामोशी से लम्हा-लम्हा ही यारों
दिल में उठता एक बवंडर देख रहा हूँ।
-अजय प्रसाद
34
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22222222222
खामोश रह के मैं खुद को सज़ा देता हूँ
बेहद गुस्से में तो बस मुस्कुरा देता हूँ ।
क्यों जुदा हो जातें है सब नाराज़ हो कर
कहते हैं लोग मै आईना दिखा देता हूँ ।
क्यूँ रह गया महरूम उनके नफरत से भी
अक़्सर ये सोंच कर आँसू बहा देता हूँ ।
फूलों की अब नही है चाह मुझे यारों
काँटों से भी अब रिश्ते मै निभा देता हूँ ।
मिल जाए आराम ज़रा अँधियारे को
शाम के ढलते ही दीया भी बुझा देता हूँ
-अजय प्रसाद
35
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
2222222222
मेरी आँखों में तेरे ख्वाब रहने दे
दिल को ज़िन्दगी भर बेताब रहने दे।
कुछ पल के लिए सही मान ले मेरी
मुझे बस अपना इंतखाब रहने दे ।
सारे नजराने ठुकरा दे गम नहीं
तेरे हाथो में मेरा गुलाब रहने दे ।
जानता हूँ राज़ तेरी ख़ामोशी का
अब सवाल तो सुन ,जबाब रहने दे ।
हो जा रुबरू तू भी सच्चाई से
सपनों से निकलजा किताब रहने दे ।
मिले तुझ को सवाब सारे जहान की
हिस्से में अजय के अज़ाब रहने दे।
-अजय प्रसाद
36
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
2222222222222
आजकल बहुत खौफ़नाक मंज़र देख रहा हूँ
चलते फिरते खुबसूरत खंडहर देख रहा हूँ ।
मिलते-जुलते हैं लगते हैं वो गले खुश हो कर
है मगर ज़मीं दिल की बेहद बंज़र देख रहा हूँ ।
डूबती नहीं हैं किश्तियाँ अब साहिलों पे आके
साहिलों से सूख रहा है समंदर देख रहा हूँ ।
आइने भी यारों अब तो खफ़ा लगते हैं मुझसे
रोज़ खुद की ही अस्थि पंजर मैं देख रहा हूँ ।
कर देता है कत्ल जो बचपन से ही कैफ़ियत
हर बच्चे के हाथ में वो खंजर देख रहा हूँ ।
मेरी हस्ती भी अजीब दो राहे पर खड़ी है
हुई है अपनी गती साँप छ्छुंदर देख रहा हूँ
-अजय प्रसाद
37
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22222222
वक्त और हालात बिक रहे हैं
जिस्म और ज़ज्बात बिक रहे हैं ।
खुदगर्ज इस दुनिया मे यारों
रिश्ते और औकात बिक रहे हैं ।
बिक रही लैला, बिक रहे मजनूँ
इश्क़ के हालात बिक रहे हैं ।
ज़र ज़ोरू ज़मीं ही नहीं अब तो
मज़हब और जात बिक रहे हैं ।
-अजय प्रसाद
38
बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222222222
चाहता जो हूँ मैं वो अब तक लिख पाया कहाँ
वो मिजाज, और फलसफ़ा मुझमें आया कहाँ
आप कहतें है, उम्दा है ,तो शायद होगा
लेकिन मेरी शायरी में वो धार अभी आया कहाँ
सो रही है जनता ज़माने से गाफिलों की तरहा
ठीक से अभी मै ज्म्हुरियत को जगा पाया कहाँ
केवल तन ही नही ,जेहन तक भी जो हिला दे
वो तब्दीली के तलातुम अभी ला पाया कहाँ
गज़लों मे तेरी ,अजय अभी बेहद कमी है
वो लहजा,वो पैनापन अभी आ पाया कहाँ
-अजय प्रसाद
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फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
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रक्खा है मैंने आस्तीन में साँप पाल के
मिलने मुझ से आना तुम भी देख भाल के ।
वैसे तो हूँ मैं दिखने में बड़ा शरीफ मगर
कर देता हूँ लोगो की मैं बुराई खंगाल के
मौके के मुताबिक मुखौटे भी हैं मेरे पास
और फिर अभिनय भी करता हूँ मैं कमाल के ।
शक्ल-ओ-सूरत भी है इन्सानो के जैसा
और फ़ितरत मेरी है यारों बस हलाल के ।
छोड़ता नहीं किसी को भी मरते दम तक मैं
रह न जाए दिल में कोई शिकवे मलाल के।
-अजय प्रसाद