तगाफुल
***
कोशिशों से कामयाब होते देखा है
जर्रे को भी आफताब होते देखा है
आप कहतें हैं कि शायरी से होगा क्या
गजलों से भी इन्क़लाब होते देखा है
****
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22222222222
धूप जब कभी बर्फ़ सी पिघल जाती है
तो पसीने में मजदूर के उतर आती है।
ठंड जब भी अपने हद से गुजर जाती है
झोपड़ी मे ठहर कर ठिठुर जाती है ।
बारिश तो जब भी खुश हो के आती है
कई गांवों और कस्बों से गुजर जाती है।
ओ मौसम के मार झेलने वाले लोगों
तुम्हारे दम पे लीडरों की दुकान चल जाती है
गर ये खुदा की ज्यादती नहीं तो क्या है
ज़िंदगी हमे मौत की तरफ़ लाती है
-अजय प्रसाद
बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222222222
आइना मुझ से अक़्सर सवाल करता है
कौन अब इस घर में तेरा खयाल रखता है
कौन सुनता है भला ये चिखें तेरे नसीहतों की
तो क्यूँ बेवज़ह फिर तू ये बवाल करता है ?
ढल गई ज़वानी है बच्चों को जवाँ करने में
जो मिला नही ,उसका क्या मलाल करता है
तकसीम हो के रह गया तू आज औलादों मे
बेखबर हो वक्त भी अब इस्तेमाल करता है ।
सांसों को है इन्तज़ार अब आखिरी नेमत का
अब देखें खुदा किस दिन मालामाल करता है ।
-अजय प्रसाद
मुतदारिक मुसद्दस सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212
चांद मुझ पे ही झल्ला गया
साथ छत पे मैं जो आ गया।
जुल्फें क्या छेड़ी मैंने जरा
गुस्सा तो बादलों आ गया
शाम तो बैठी है रूठ कर
उनसे मिल के जो मैं आ गया।
फूल सा रे फफक ने लगे
काँटो को भी तरस आ गया
लोग जल जाते हैं जब अजय
तू ज़माने को भी भा गया
-अजय प्रसाद
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बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222222222
निकल गया साँप और हम लकीर पीट रहें हैं
मर चुकी है आत्मा शरीर घसीट रहें हैं ।
जीवन है तो है ज़िंदा रहने का हुनर भी
हम सब तो बस कर उसको ही रिपीट रहें हैं ।
होते नहीं हैं लोगों के किस्मत में घर हमेशा
घर किसी के लिए फुटपाथ और स्ट्रीट रहें हैं ।
-अजय प्रसाद
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फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22222222
कुछ के लिए मै खास लिखता हूँ
कुछ के लिए बकबास लिखता हूँ ।
हाँ सच कहते है जनाब आप
खो के होशोहवास लिखता हूँ ।
हो कैसे गज़लें मेरी मासूम
हो कर मै बदहवास लिखता हूँ ।
उतर आती है कागज पे आँखों से
सच को बे-लिबास लिखता हूँ ।
बूंद को बुरी लगती ये बात
सागर को है प्यास लिखता हूँ ।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
2222222222
अपने ही मेयार पे चल नहीं पाया
जमाने की सोंच मै बदल नहीं पाया ।
हरबार हमने थे तय किये कुछ बातें
मगर किसी पर भी कर अमल नहीं पाया
कोशिशें की मैंने लाख टालने की
मगर बला कोई भी टल नहीं पाया ।
अरमान मेरे दिल में छटपटा के रह गए
इक भी यारों कभी निकल नहीं पाया ।
-अजय प्रसाद
हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़बूज़ महज़ूफ़
मफ़ऊल मुफ़ाइलुन फ़ऊलुन
2211212122
बस एक दुआ कबूल हो जाए
फ़िर चाहे सब फिजूल हो जाए।
ढा ता है जो जुल्म बेबसों पर
जीना उसी का बबुल हो जाए ।
इमदाद नहीं तो रिज़्क भी क्यों
धनवानो का उसूल हो जाए ।
हम मजलूमों के हक़ में फिर से
पैदा और इक रसूल हो जाए ।
मर जाने कोई गम न होगा
गर इल्तिज़ा ये कबूल हो जाए
-अजय प्रसाद
मुतदारिक मुसद्दस सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212
या रब अब तो कुछ आसान कर
हम को भी गम से अन्जान कर ।
ज़िन्दगी जिनकी बे रहम है
उनको तू अपना मेहमान कर
अश्क़ रोने को ही अब नहीं
आंखो पर भी एहसान कर।
मेरी तो कोई सुनता नहीं
जारी तू अच्छी फरमान कर ।
जैसे दी अच्छी सूरत हमें
खूबसूरत भी इन्सान कर ।
थक चुके हम इवादत से हैं
कुछ इधर हम पे भी ध्यान कर ।
कब तलक मायु सी मीलेगी ।
पूरे हम सब के अरमान कर ।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22 22
साहित्य से मेरा कोई सरोकार ही नहीं
और शायरी मजबूरी है व्यापार भी नहीं।
गज़लें कहना या लिखना कवितायें हैं कायरता
कुछ इसके अलावे कोई हथियार भी नहीं।
कहतें हैं आप कि बेहद उम्दा लिख रहा हूँ
लगता है मुझको की ये तैयार अभी नहीं ।
आँखो से होकर कागज़ पे है उतर जाती
मेरी गजलों को हुस्न का दीदार ही नहीं
है कहाँ किसी भी अदब का भी इल्म ही मुझे
और मेरी गज़लें मेरे दिल का प्यार भी नहीं
घुट रहा हूँ मै किस तरह से किसको है पता
मेरे जैसा कोई शायद लाचार ही नहीं
जाने लोग क्यों मुक़रते हैं मुझको पढ़कर
क्या मैं आपके तनक़ीद का हक़दार भी नहीं
-अजय प्रसाद
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 2
वो मुझको मेरे अंदर से ले गया
सारा पानी समंदर से ले गया ।
रह गयी हैं वीरानगी अब दिल में
पूरी महफिल अंदर से ले गया।
लहरें ,न कश्ती ,न अब किनारे है
पूरी हस्ती सिकंदर से ले गया ।
रूठ गई ज़िंदादिली जिंदगी से
मस्ती वो सब कलंदर से ले गया ।
जिम्मेदारियों ने जकड़ा इस कदर
ज़ोशो जुनूँ धुरंदर से ले गया ।
रह गई होठों पे बस खमोशियां
सारी शिकायतें अंदर से ले गया ।
-अजय प्रसाद
2122 211 22
हम से ही सरकार खफ़ा हैं
जाने क्यों बरखुरदार खफ़ा हैं ।
चिढ़े-चिढ़े रहते हैं वो अब तो
क्या कहें कब से यार खफ़ा हैं ।
उनको शक़ है हमारी वफाओं पे
शिकवे-गिले भी हज़ार खफ़ा हैं ।
लाख जतन कर हार गए हम
दिल में रंज के गुबार खफ़ा हैं ।
दे कर जां हम बता एंगे उनको
शायद करें यकीन बेकार खफ़ा हैं ।
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22222222222
शोहरत पर भी अपने वो ध्यान देतें हैं
इसलिए तो वो विवादित वयान देतें हैं।
लगने न पाए लफ्जों के तलवार में जंग
उन्हें वो अक़सर ही मज़हबी म्यान देतें हैं।
जब कभी भी जनता जाग जाती है यारों
फ़ौरन धर्म की रक्षा का ज्ञान देतें हैं ।
भीड़ हो चाहे किसी भी धर्म या जाति का
समय भड़कने लिये एक समान देतें हैं।
लगता है कि तू भी जान गंवाएगा अजय
तेरे जैसों को तोहफ़े में शमशान देतें हैं।
-अजय प्रसाद
बह्र-ए- मीर
फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन
22222222
गर सब बुरे हैं तो अच्छा क्या है
अबे तू इतना सोंचता क्या है।
नुक्स जो निकालता है हर बार
अपने आप को समझता क्या है।
तेरे जैसे कई आए और गए
तेरी बातों से फ़र्क पड़ता क्या है।
जंग लग गई है ज्म्हुरियत में
इक वोट के सिवा जनता क्या है।
क्या उखाड़ लोगे गजलों से
अजय और भला तुम्हें आता क्या है।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
2222222222
वो अपनी परछाई से डरता है
मतलब वो सच्चाई से डरता है ।
बरतता है एहतियात बेहद वो अब
क्योंकि अब रुसवाई से डरता है ।
जानता है कि जोखिम हैं रास्तों में
इसलिए तो रहनुमाई से डरता है।
क्यों कर करेगा भला किसी का भी वो
जो औरों की भलाई से डरता है।
आ तो गया हूँ मैं बिन बुलाए यारों
दिल है कि पज़िराई से डरता है।
तुझको तो आदत पड़ गयी अजय अब
तू क्यों अपनी बुराई से डरता है।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22222222222
इच्छा एवं शक्ति के बीच जो दूरी है
आम आदमी की एक बड़ी मजबूरी है ।
बीवी-बच्चे व स्वयं की मांगे हैं अथाह
और विचारे की थोड़ी सी ही मजूरी है।
खुद्कुशी ख्वाबों का करना तय है मंजिल
दफन हसरतोँ का होना भी ज़रूरी है।
राहत की सांस और सुकून की ज़िन्दगी भी
अजी वो तो जैसे कोई मृग कस्तुरी है ।
तुम भी अकेले ही क्या कर लोगे अजय
तुम्हारी भी तो कुछ अपनी मजबुरी है ।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22
आईये अब हम सब कुछ नया करें
जो भी हैं बुरे उन्हें ही अच्छा कहें।
जब जेहन में ही जहालत भरी हो तो
फिर क्या फर्क पड़ता है किसी को क्या कहें ।
तोड़तें हैं चौराहों पर लगी प्रतिमाएं
और अपने पूर्वजों को ही बुरा कहें।
घोटें सच का गला अपने हाथों से
और लाश बन के हम चुपचाप रहें ।
तू अजय इतना क्यों है सोंच में पड़ा
कह अपने कलम से अपनी हद में रहें
-अजय प्रसाद
वक्त कि मार से यारों बच पाओगे क्या
जो अब तक हुआ ही ,नहीं कर पाओगे क्या
वादा किया था साथ निभाने का उम्रभर
तो मुझको आजमाने फिर आओगे क्या।
तुम भी अजय किस बात पर अड़ के बैठे हो
उसने ने कह दिया नही तो मर जाओगे क्या
-अजय प्रसाद
सरे_ मुसद्दस मसकन मक़तो मनहोर
फ़ाएलातुन मफ़ऊलुन फ़े
2122 222 2
अपने ही घर में हूँ बेघर सा
हो गया है दिल भी पत्थर सा।
देखता हूँ सुनता हूँ चुपचाप
रहता हूँ कोने में जर्जर सा।
था महल सा मैं गुलज़ार कभी
आज़ दिखता हूँ मैं खंडहर सा।
****
बह्र-ए-मीर
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 2
जो है नही उसे पाने की चाह में
गुजर रही है शबो-रोज़ आह में ।
महफ़िलों में भी अब रौनक न रही
है लज़्ज़त भी नहीं वाह!वाह!में।
तलाश मंजिल की होती बेमज़ा
गर न मिले ठोकर हम को राह में ।
इश्क़ इस दौर इक इदारा है यारों
लगतें हैं चंदे ज़िस्म ओ निगाह में ।
अजय तू क्यों फ़िक्रमंद है बेहद
हस्ती तेरी है वक़्त-ए- पनाह में
-अजय प्रसाद
***
बाज़ार से तु वेज़ार क्यूँ है
खुद से ही इतना खार क्यूँ है ।
हसरतें तु हैसियत में रख
पाले ख्वाहिशें हज़ार क्यूँ है ।
फिर से इंतखाब आने को है
समझा ,मेहरबाँ सरकार क्यूँ है ।
इनकी हस्ती है अजय तुझसे
वरना सांसे मददगार क्यूँ है।
-अजय प्रसाद
देखना तू हद से मैं गूजर जाऊँगा
बिन तेरे भी तुझे जी कर दिखाऊँगा ।
नाज़ है उसे अपनी खूबसूरती पे
देख के उसको मुकर जाऊँगा ।
अब देखना मेरी इन्तेहा-ए-बेरुखी
तेरी नज़रों से मैं खुद उतर जाऊँगा।
चाहा था जिस शीद्द्त से तुझे मैनें
उसी शीद्द्त से नफरत भी निभाउँगा।
ये अलग बात है अजय कुछ भी कहे
भला कैसे मैं उस को भुला पाऊँगा ।
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बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुरब्बा मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 2
नींदे मेरी ख्वाब तेरे
कांटे मेरे गुलाब तेरे।
ऐसा अक़्सर होता है
गज़लें मेरी आदाब तेरे।
खुशियाँ तेरी गम मेरे
दुआएं मेरी शबाब तेरे ।
बेहद खामोश रहते हैं
सवाल मेरे जवाब तेरे।
हालत मेरी अज़ीब है
ज़िंदगी मेरी अज़ाब तेरे
-अजय प्रसाद
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 2
हाँ सच है यारों कि जमाने लगे
अब तो मुझे भी लोग बुलाने लगे
चेह्रे पे बाप के रौनक आगई
सारे बेटे जो अब कमाने लगे ।
हो गया मै जब से ज़रा सा मशहूर
सलाम रिश्तेदारों के आने लगे
आ गई मुझको भी है अदाकारी
हम भी सच्चाई कुछ छुपाने लगे ।
अब मान लो अजय हो पुराने तुम
अब तो आईने भी चिढ़ाने लगे ।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
2222222222
यादें तेरी हैं मुझ पे मेहरबान बहुत
तन्हाईयों का है एहसान बहुत ।
ख्वाबों ने तो खूब छला है जी भर कर
आंखों के है आँसू मेहमान बहुत ।
दिया है दिल ने तो बस दगा ही अक़सर
रहती है धडकन भी सुनसान बहुत ।
छीन तो ली है वक्त ने जवानी मेरी
ख्वाहिशें मगर है अभी जवान बहुत ।
महफ़िलों से तो रही रंजिशें ही हर दम
खुश रहते हैं मुझ से ये वीरान बहुत ।
-अजय प्रसाद
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फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 22 22 2
तू इमानदार है या नहीं अपने अंदर से पूछ
हारा क्या था सब कुछ वो जीत कर सिकंदर से पूछ।
खामोशी समेटे रहती है राज़ न जाने कितने
लहरों से क्या पूछता है,गहरे समंदर से पूछ ।
रहता था जो शख्स जवानी के जोश में अकड़ कर
वक़्त ने क्या कर दिया है हाल उस धुरंदर से पूछ ।
खुदा की खिदमत में गुज़ार दिया है ये उम्र जिसने
कितनी मस्ती में गुजारी है उस कलंदर से पूछ ।
क्या क्या करतब है करने पड़ते पेट भरने को भी
जा मदारी के डमरू पे नाचने वाले बन्दर से पूछ
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 22 2
लगा निखरने हूँ मैं उनसे नजरें मिला कर
करता हूँ बातें अब तो सबसे मुस्कुरा कर।
हो ने लगा है मुझे यकीन अब तो खुदा पे
जब से किया इकरार उसने आँखें झुका कर।
गुजर रही थी ज़िंदगी गुमनाम बेसबब
कर दिया है मशहूर उसने अपना बना कर ।
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बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22
ज़ख्मों को कुरेदने का हुनर जो है
दुश्मनी निभाने में बेहतर वो है ।
दे रक्खा है जिसने दिल किराये पर
यारों इश्क़ में बेहद मोतबर वो है।
कर लिया किनारा करीने से उसने
साथ डूबने से ज़रा बेहतर तो है।
कर रही है ज़िन्दगी इस्तेमाल मेरा
गफ़लत में मेरी ये सारी उमर जो है
भा गया है अब मुझ को भी भटकना ही
मंज़िल नहीं राहों में पत्थर तो है
खंगाल रहे हैं वो खाक़सार को
खुश हूँ मैं अजय की उन की नज़र तो है
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22 22
हाशिए पे रह कर जो कुछ हासिल करतें हैं
दुनिया में लोग उसको ही काबिल कहतें हैं।
संभलते ही नहीं हैं जो ठोकरों बाद कभी भी
ऐसे ही अहमक़ माहिरों को गाफ़िल कहतें हैं ।
लाखों की भीड़ में जो खुद को साबित कर दे
वैसे हुनरमंदो को सब लोग कामिल कहतें हैं ।
इंसानियत को जो समझे है फ़र्ज़-ए-मज़हब
अदब की दुनिया में उसे हम आदिल कहतें हैं ।
आ गए फ़िर से अजय तुम अपने शेर सुनाने
तुम जैसे शायरों को ही जाहिल कहतें हैं।
-अजय प्रसाद
मोडर्न दौर में करना प्यार
मतलब आ बैल आ मुझें मार।
हुस्नोईश्क़ की हरकतें ऐसी
जैसे कि जनता औ सरकार
आशिक़ी में आजकल सभी हैं
यारों बहुत ही चालू समझदार
हैं लैला-मजनू अब आउटडेटेड
इन्टरनेट पे करने लगे प्यार
*****
सच है कि वक्त बदल रहा है
खोंटा सिक्का ही चल रहा है।
सिधा-सादा सच्चा औ अच्छा
आजकल सबको खल रहा है।
बद्तमीज़ बच्चे,बेबस बुजुर्ग
समय दोनो को छ्ल रहा है ।
मतलबपरस्ती से हुस्नोईश्क़
रोज़ नये सांचे में ढल रहा है।
देख लिया अजय इस दौर में
इंसानियत घुटनों के बल रहा है।
****
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 22 2
वो मुझको खतरों से आगाह करता है
तो क्या सचमुच मेरी परवाह करता है।
लहज़ा तो रहता है उसका धमकी से भरा
क्यों मेरी गज़लों पे वाह वाह करता है ।
कब कहा है मैनें इन्क़लाब करूंगा मैं
फ़िर इन्तजाम क्यों खामखाह करता है।
शायद उसने किया था प्यार मुझे बेहद
इसलिए अब नफरत बेपनाह करता है।
जाओ अजय किस भरम में जी रहे हो तुम भी
कौन है जो अब तुम्हारी परवाह करता है ।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22 22
पढ़ता हूँ तुझे हर रोज मैं अखबार की तरह
सुनता हूँ तेरी हर बात समाचार की तरह ।
तू मुझे देखे या न देखे ये है तेरी मरज़ी
देखता हूँ तुझको मैं आखरी बार की तरह ।
इतनी आसानी से कैसे मुकर जाते हैं लोग
भूल जाते हैं वायदे नयी सरकार की तरह ।
आँखें अब तरस रही है देखने को वो मंज़र
रहते थे जहाँ मिलके सब इक परिवार की तरह ।
क्या पड़ने लगें हैं दौरे पागलपन के अजय पे
करता है बातें क्यूँ वो बेज़ार की तरह ।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22
कोशिशें मेरी रंग लायेगी ज़रूर
सफ़र में हूँ मंजिल आयेगी ज़रूर ।
लाज़्मी है लगना ठोकर रास्तों पे
ज़िंदगी मेरी संभल जायेगी ज़रूर ।
लगता है वक्त लोगों को अपनाने में
मेरी भी बातें समझ आयेगी ज़रूर ।
भले हो ये बाद मेरे मरने के शायद
गजलें मेरी भी वो गायेगी ज़रूर ।
खुश है देख के आज परेशां मुझको
नाकामियां मेरी पछतायेगी ज़रूर ।
-अजय प्रसाद
मै तो गया गुजरा ठहरा ,तू बता
हाशिये पे हरदम ही रहा,तू बता ।
बह्र -ए-मीर
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 2
मुल्क में काम विकास का जारी है
और जनता इसकी आभारी है।
रास्तों में गड्ढे जुओं के अड्डे
भूख ,गरीबी और लाचारी है।
दहशत में रहतीं हैं बेटियाँ यहाँ
रहते मजे में बलात्कारी है ।
घुटता है दम अब दरियादिली का
खुशहाल यारों भ्रष्टाचारी है
एशोअराम से हैं बेईमान
बदहाल तो बस इमानदारी है।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसम्मन मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 22 22 22 2
हरएक शायर शायरी में खुद को गमगीन बता रहा है
ये और बात है हर ऐशो-आराम से पिज़्ज़ा खा रहा है ।
एक से एक नमूने के तौर पे पेश करता है वो शेर
जैसे पूरी दुनिया का रन्ज़ो गम बस उसे ही सता रहा है ।
मिलते ही मौका लग जाता है खुद को साबित करने में
हर एक मुद्दे पर वो अपनी काबिलियत आजमा रहा है ।
कवियों की कविताओं से तो परेशान हैं समस्याएँ
सोंचतें होंगे शब्दों के छड़ी से क्यूँ पीटा जा रहा है ।
हल तो एक भी मसले का कर नहीं पाए शेरों से अपने
दिखावे के लिए साहित्य में छाती पीटा जा रहा है ।
तू भी अजय कहाँ पीछे है किसी कमज़र्फ कवि से भी
अपनी शायरी में तू भी तो उन्हीं चीज़ों को दोहरा रहा है ।
-अजय प्रसाद
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 2
अच्छे-बुरे का दावा नहीं करता
मतलब कि दिखावा मैं नहीं करता ।
मेरी हैसियत भी नहीं कुछ बोलूं
और शोरशराबा मैं नहीं करता ।
सोता हूँ चैन से रातों को, क्यों कि
दिन भर कोई छ्लावा मैं नहीं करता ।
खुश हूँ मैं कि खुदा की रहमत है
कोई भी पछतावा मैं नहीं करता ।
हाँ ज़ख्मों पे मरहम लगा ता हूँ
यारों कोई मुदावा मैं नहीं करता ।
-अजय प्रसाद
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22
हुस्नोइश्क़ के अलावे है कुछ, तो सुना
सच्चाई क्या है दुनिया को भी बता ।
आ गई है अक़्ल ठिकाने अब आशिक़ो के
लैला दिखी और न तो कोई मजनूँ दिखा ।
दिल लगातें हैं अब दुरुस्त रख के दिमाग
साथ देतें हैं जब तक करतें हैं वफ़ा
जब भी मौका मिलता हैं मिल लेते दोनो
शिकवा है किसी से न तो कोई है गिला ।
प्यार कितना प्रैक्टिकल हो गया यारों
हो गया प्यार उसी से जो वक्त पर मिला ।
है खूबी ये इस दौर के आशिक़ों में
भूला देता है उसको जो नहीं मिला
-अजय प्रसाद
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 2
अब चुप भी हो जा क्या बकता है
हुजूर आएं हैं वो नहीं दिखता है ।
आ उम्मीदें ले और जा एश कर
कुछ भी इसके सिवा नहीं मिलता है ।
रोना तू जो रोता है गरीबी का
तू भी विपक्षी दल का लगता है ।
हैं फ़ख्र से फ़ाईलों में योजनाएं
और तू फ़िर भी हमे ही कोसता है ।
और उस अजय की औकात ही क्या है
जो तारीफ़ के टुकड़ों पे पलता है ।
-अजय प्रसाद
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22 22 22
उस्ताद कई हैं जो शेरों-शायरी सिखातें हैं
और बे-बहर लिखनेवालों की औकात बतातें हैं ।
बे-अरूज़ गज़ल कहना भी है यारों उनकी नज़र में गुनाह
जब की पेट पालने के लिए वो कहीं और से कमातें हैं ।
मतला,मकता,काफ़िया ,रदीफ़ या मिसरा के साथ-साथ
क्या है रुक्न और कितने हैं बहर सब बतातें हैं ।
क्या होता हैं तरही मुशायरा और क्या है ये फिलबदीही
बेहद बारीकी से सारे पहलुओं को वो बता तें हैं ।
काफ़िये के कायदे-कानून और कवायद रदीफ़ के
वल्की कैसे मात्रा गिना जाता है ये भी बतातें हैं ।
क्या है मात्रा गिराने के छूट के फायदे शेरों में
कैसे कही जातें हैं गज़लें बहर में यारों सिखातें हैं ।
कई नामी गिरामी शायरों के शेरों पे होती है बहस
और नये गज़ल कारों को उनके नाम से डरातें हैं ।
सब जानते है कि ज़िंदगी शायरों की गुजरी कैसे
लेकिन बस उनके लिखे कलामों को ही गिनातें हैं ।
तेरा क्या होगा तू भी समझ तो ले इक बार अजय
क्या पता तुझे कहाँ से ये लोग इतना जोश लातें हैं ।
-अजय प्रसाद
फ़ेलुन