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13 May 2025 · 6 min read

कहानी: "हार का जश्न (अभिलेश श्रीभारती) लेखक और कहानीकार—अभिलेश श्रीभारती

हर कहानी की एक आत्मा होती है — कुछ कहानियाँ प्रेरणा देती हैं, कुछ चेतावनी, और कुछ एक आईना बनकर समाज के चेहरे पर पड़ा मुखौटा हटा देती हैं। यह कहानी ऐसे ही एक आईने की तरह है — जिसमें झूठ का जश्न और सच्चाई का संघर्ष आमने-सामने खड़े हैं।

प्रस्तावना — “हार का जश्न

कुछ कहानियाँ आँसुओं में भीगती हैं, कुछ गर्व में सिर ऊँचा करती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो भीतर तक हिला जाती हैं — क्योंकि वे सच कहती हैं, वह भी तब जब पूरा संसार झूठ का ढोल पीट रहा होता है।

यह कहानी उन्हीं क्षणों की है, जब किसी देश के वीर सपूत रणभूमि में शहीद हो जाते हैं और उनके घरों में मातम पसरा होता है — लेकिन कहीं दूर, उन्हीं मौतों पर जश्न के पटाखे फूटते हैं, भाषण दिए जाते हैं, और हार को जीत का नाम दे दिया जाता है।

“हार का जश्न” एक ऐसी सच्चाई है, जो बताती है कि झूठ को कितना भी रंग दो, वह सच्चाई की रोशनी में फीका पड़ जाता है। यह कहानी केवल दो देशों की नहीं, दो सोचों की है — एक जो सच्चाई से सीखती है, और एक जो झूठ में ही जीत ढूँढती है।

इस कहानी के हर शब्द में उन वीरों की धड़कनें हैं, जो बिना किसी शोर के बलिदान देते हैं — और एक गूंगी चीख भी, जो उन जश्नों के शोर में कहीं दब जाती है।

क्योंकि सच्ची विजय वही होती है, जो खामोशी से झुके सिर और भीगी आँखों में दिखाई देती है — न कि झूठे नारों और झंडों की भीड़ में।

एक बार की बात है, दो पड़ोसी गांव थे – “संघर्षगढ़” और “झूठगढ़”।

संघर्षगढ़ के लोग मेहनती थे। वे हर बार अपने खेत खुद जोतते, खुदा भरोसे नहीं रहते। अपने नाम की तरह, सत्य के मार्ग पर चलने वालों का गांव था। वहां के लोग गलती को स्वीकारना जानते थे। जब सूखा पड़ा, तो उन्होंने कुएँ खुदे। जब बाढ़ आई, तो उन्होंने बंध बनाए। वे अपने पसीने से धरती सींचते और अपनी भूख पर संयम रखकर जीवन की लहरें पार करते। अपने उन्नति को हमेशा प्राथमिकता देते हुए प्रयासरत रहते थे।

संघर्षगढ़ की कामयाबी को देखकर झूठगढ़ समय समय पर हर तरीके से संघर्षगढ़ में अशांति फैलाने के लिए तरह-तरह के साजिशें को अंजाम देता रहता था। वहीं, झूठगढ़ के लोग बड़ी-बड़ी बातें करते थे, बात-बात पर झूठगढ़ के नेता संघर्षगढ़ को मिट्टी में मिलाने का धमकी देता था। हमेशा खून की नदियों बहाने का बात करता था। पर असल में उधार की रोटियों पर जिंदा रहते थे। वे हर बार जब कोई उन्हें रोटी उधार देता, तो गांव में ढोल बजता – देखो दुनिया हमें उधार देती है”हमने जीत ली दुनिया!”

एक दिन झूठगढ़ अपनी नापाक हरकतों से बाज ना आते हुए संघर्षगढ़ में अशांति फैलाने की साजिश को अंजाम दिया और इसमें संघर्षगढ़ के कई लोग मारे गए। गांव के मुखिया ने तत्काल आपातकाल बैठक की और झूठगढ़ के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया।
शांति और अशांति के इस जंग में संघर्षगढ़ ने झूठगढ़ को हर एक प्रकार की अशांति का जिम्मेदार बताते हुए को झूठगढ़ को पूरी तरीके से बर्बाद और तबाह कर दिया। संघर्षगढ़ के सैन्य सुरक्षा बलों ने झूठगढ़ में घुसकर उनके नौ सुरक्षा केंद्र ध्वस्त कर दिए गए, सौ सैनिक के साथ कई सारे लोग मारे गए और कई सारे लोग लापता तथा घायल हो गए। गांव की गलियों में मातम पसरा, लेकिन अगले ही दिन ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न हुआ।। लेकिन अगली सुबह झूठगढ़ में मिठाई बंटी – “हमने दुश्मन को जवाब दे दिया!”

“हमने दुश्मन को सबक सिखा दिया!”
“हमारी बहादुरी की मिसाल कायम हो गई!”
“शहादतें हमें कमजोर नहीं, और मज़बूत बनाती हैं!”

इन नारों के बीच, रोटियाँ कम थीं, पर भाषणों में भरपूर गर्मी थी।
कब्रें खुदी थीं, मगर उनके ऊपर फूल नहीं, बैनर लगे थे।

संघर्षगढ़ के वृद्ध दयाराम जो एक सच्चे सैनिक रह चुके थे, दूर खड़े होकर देख रहे थे। उन्होंने आह भरकर कहा,
“जिन्हें मातम में भी जश्न नजर आता है, उन्हें ज़िंदगी का मूल्य कौन समझाए?”
“जिसे हार में भी जीत नजर आए, उसका इलाज कोई नहीं कर सकता।”

कुछ दिनों बाद, झूठगढ़ की हालत और बिगड़ गई। अनाज खत्म, पानी सूखा, खजाना खाली। गेहूं का भंडार खत्म, तेल के दीपक बुझ गए। गांव के मुखिया ने विदेशी नगर IMFपुर से भीख माँगी – कुछ अनाज, थोड़ा कर्ज, और बहुत सारे वादे।

IMFपुर ने भारी ब्याज पर एक बोरी अनाज भेजी।
झूठगढ़ फिर झूम उठा –
“देखो दुनिया हमारी ताक़त से डरती है!”
“हमें कर्ज देना उनकी मजबूरी है!”

उसी शाम, झूठगढ़ का एक 10 वर्षीय बालक ‘हाशिर’ अपनी माँ के साथ भूखा बैठा था। माँ की आंखों में पानी था, पर चेहरे पर एक खामोशी थी।

हाशिर ने पूछा,
“माँ, जब हमारे पास खाना नहीं, हमारे घर के लोग मर रहे हैं, तो हम खुशी क्यों मना रहे हैं?”
माँ ने लंबी सांस ली, फिर बच्चे को गोद में लेते हुए बोली,
“बेटा, कभी-कभी झूठ इतना बार दोहराया जाता है कि वह सच लगने लगता है… और हमारे गांव ने सच से डरना सीख लिया है।”

उधर संघर्षगढ़ में, लोग खामोशी से काम में लग गए। उन्होंने न ढोल पीटे, न भाषण दिए। उन्होंने अपने खेत फिर जोते, बच्चों को स्कूल भेजा, जवानों को सम्मान देते हुए झूठगढ़ को अंतिम चेतावनी देते हुए छोड़ दिया।

एक पत्रकार ने संघर्षगढ़ के एक किसान से पूछा,
“आपने कोई जश्न नहीं मनाया, क्यों?”
वह किसान मुस्कराया, और बोला:
“हमारे चेहरे पर जो मुस्कराहट देख रहे हैं वही तो हमारे असली जीत है और जो कोई भी इस मुस्कुराहट में हमारी शांति को भंग करने की कोशिश करेगा। हम हमेशा उससे निपटने को तैयार बैठे हैं।
काफी समय बाद
झूठगढ़ आज भी अपने खोखले जश्नों में डूबा है। IMFपुर से और बोरी अनाज आई है, और वहां के समाचार चैनल चिल्ला रहे हैं – “हमने फिर जीत हासिल की!”

पर हाशिर अब बड़ा हो रहा है… और अभी भी वह अपने आप को झूठगढ़ में जन्म लेने पर अपनी किस्मत को कोस रहा है।

———
जीत केवल तोपों और कर्ज की होती तो हर उधार लेने वाला बादशाह कहलाता।
सच्ची जीत आत्मनिर्भरता, सच्चाई और स्वाभिमान से मिलती है।
और जो हर हार में जीत ढूंढे, वह अंततः खुद से ही हार जाता है।
“अभिलेश श्रीभारती”
(लेखक और कहानीकार)

संदेश:
मेरे द्वारा लिखी गई यह कहानी पाकिस्तान जैसे देशों की उस सोच पर चोट करती है जो हर पराजय में भी विजय का भ्रम फैलाते हैं, और हर उधारी को गौरव समझते हैं। ऐसे में असली सवाल यह नहीं कि कौन जीतता है, बल्कि यह है कि कौन सच्चाई के साथ जीता है।

इस कहानी “एक लेखक के दृष्टिकोण गहराई, यथार्थवाद और नैतिक चेतना से भरपूर करने का प्रयास किया है। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से सत्य, आत्मनिर्भरता, और वास्तविक संघर्षों के पक्ष में है, जबकि झूठ, आडंबर, और खोखले प्रचार के विरोध में।

मैं इस कहानी के लेखक के तौर पर निम्नलिखित दृष्टिकोण को उजागर करता है।

1. सच बनाम झूठ की टकराहट
संघर्षगढ़ को सत्य, श्रम और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाते हैं, वहीं झूठगढ़ को झूठे दावों, उधारी की मानसिकता और खोखले दिखावे का प्रतीक। उनका दृष्टिकोण यह है कि सच्ची जीत कभी ढोल-नगाड़ों या भाषणों से नहीं मिलती, बल्कि कर्म और संकल्प से मिलती है।

2. बलिदान का सम्मान बनाम जश्न की साजिश
हम यह दिखाते हैं कि जब सच्चे सपूत मरते हैं, तब सच्चे लोग मौन रहते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं, जबकि झूठी मानसिकता वाले समाज उन मौतों पर भी जश्न मनाते हैं। मेरा संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से उन वीरों के लिए है जिनका बलिदान दिखावे में खो जाता है।

3. राजनीति के खोखले वादों की आलोचना
IMFपुर जैसे प्रतीकात्मक नामों से यह दिखाते हैं कि कैसे असफल और दिखावटी राष्ट्र दूसरों की दया पर जिंदा रहते हुए भी अपने अहंकार में डूबे रहते हैं। यह एक तीखा व्यंग्य है उन देशों पर जो कर्ज और पराजय को भी जीत की तरह प्रस्तुत करते हैं।

4. सामाजिक चेतना और आत्मावलोकन की आवश्यकता
बालक हाशिर के संवाद के माध्यम से मैंने समाज की अंधभक्ति और झूठ की राजनीति पर सोचने के लिए मजबूर करते हैं। लेखक का मानना है कि जब समाज सच से डरने लगता है, तब वह खोखले गौरव में जीने लगता है।

5. शांति और श्रम की सच्ची पूजा
संघर्षगढ़ के किसान और वृद्ध सैनिक जैसे पात्रों के माध्यम से मै इस बात को स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक विजय खामोश होती है, जिसमें शांति और श्रम की पूजा होती है, न कि नारे और झंडे।

इस कहानी के लेखक होने के नाते मेरा दृष्टिकोण गहराई से देशभक्ति, नैतिकता और सच्चे आत्मगौरव की ओर झुका हुआ है। मैं उन समाजों और राष्ट्रों की आलोचना करता हूं जो केवल प्रचार और झूठ के सहारे खुद को महान मानते हैं। मैं मानता हूं कि सच्ची विजय आत्मनिर्भरता और सत्य के रास्ते से ही मिलती है, और यही संदेश मैं अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता हूं
“अभिलेश श्रीभारती)

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