ये फिजायें जब भी, बेसब्र बारिशों से दिल लगती है,
ये फिजायें जब भी, बेसब्र बारिशों से दिल लगती है,
तेरी आवाजें मेरी, इन खामोशियों में गुनगुनाती हैं।
आंधियां जब भी, सोये दरख्तों का साथ पाती हैं,
तेरी खुशबुएं चुपके से, मेरे घर को आ महकाती हैं।
खिड़कियों पर जब भी, हवाएं महफिलें अपनी जमाती हैं,
अनखुली चिठ्ठियां बिखरकर, कोनों में सिमट जाती हैं।
टीन की छत जब भी, जलतरंगों का धुन बजाती हैं,
यादों की तस्तरियाँ, इक अधूरे इश्क़ से भर जाती हैं।
शरारतें इन बूंदों की, जो धरा की ख़्वाहिशें जगाती हैं,
तेरी आहटों के भ्रम को, मेरी धड़कनों में सजाती हैं।
ये बादल अपने लिहाफ, जब वादियों को ओढ़ाती हैं,
भूली कहानी की किताब का, एक हिस्सा नया लिख आती है।
धुंधली राहों की कसक, जब भी क़दमों को भटकाती है,
एक डोर अनजानी सी, जज्बातों की बेहोशी से मुझे उठाती है।