एक साक्षात्कार आदरणीय गुरु जी संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा ---
इण्टरव्यु(साक्षात्कार )संजय कौशिक विज्ञात सर
द्वारा—
विज्ञात: डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’ जी! वैसे तो आप किसी परिचय के मोहताज नहीं है। लेकिन फिर भी हमारे पाठक आपका परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते हैं?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में स्थित बलुआ नाम के एक गांव में हुआ था। मेरे पिता जी का नाम श्री बासुदेव सिंह तथा माता जी का नाम श्रीमती कैलाश देवी है।मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई थी तथा
छठी व सातवीं कक्षा की पढ़ाई कानपुर में । आठवीं से लेकर पीएच.डी.तक की शिक्षा इलाहाबाद में पूरी हुई। मेरा विवाह देवरिया के नेमा गांव के श्री राजेश्वर सिंह से हुआ है।मै इस
समय दिल्ली शिक्षाविभाग में हिन्दी की अध्यापिका हूं।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! फिर साहित्य के प्रति आपकी रुचि कैसे जागृत हुई?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! हिन्दी साहित्य से मेरा शुरू से ही लगाव था।
विद्यार्थी जीवन में थोड़ा बहुत लिखती भी थी।
मुझे प्रेमचंद के उपन्यासों तथा कहानियों को
पढ़ना बहुत अच्छा लगता था। शायरी तथा
कविता लिखने का भी शौक था परन्तु चुपके चुपके लिखती और छिपा देती थी किन्तु विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण लिखने का अवसर ही नहीं मिला। आज से चार साल पहले सन् 2016से अपने मित्रों तथा पुत्र के प्रोत्साहन के फलस्वरूप फिर से थोड़ा थोड़ा लेखन कार्य आरंभ किया।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! साहित्य से पृथक अभिरुचि के विषय क्या क्या हैं ?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! साहित्य से पृथक अभिरूचि घूमना पसंद
करती हूं। मुझे अलग-अलग स्थानों पर जाना
और घूमना पसंद है।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! आपकी पसंदीदा विद्या कौन सी है, जिसमें आप ज्यादा लिखना पसंद करते है?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! मुझे छन्दमुक्त कविता , कहानी व संस्मरण
लेख आदि लिखना पसंद है।छन्दबद्ध कविता
लिखना भी अच्छा लगता है इनमें विशेषतः दोहा ,मनहरण, कुण्डलियां तथा गीत, नवगीत
आदि हैं।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! साहित्य की एक वह विशेष बात क्या रही जिसने आप को सबसे अधिक आकर्षित किया?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! साहित्य की सबसे विशेष बात मुझे यह लगी की उसके द्वारा जीवनमूल्यों के सन्देशों को जन- जन तक पहुंचाया जा सकता है। यही वह विधा है जिसके द्वारा मन के भावों की अभिव्यक्ति सहजता से की जा सकती है।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! आप अपनी सशक्त लेखनी के लिए जिम्मेदार किसको मानते हैं अर्थात प्रेरणा स्रोत किसे मानते हैं?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! इसके लिए छंद ज्ञान आपके सानिध्य में चल रहा है छंद गुरु आप ही हैं।अतः संजय कौशिक विज्ञात गुरु जी मैं दिल से आभारी हूं। आपके ही सहयोग से मैं छन्दबद्ध कविता लिखना सीख
पायी। प्रेरणा स्रोत कहूं तो मेरा अपना ही बड़ा पुत्र रवि कुमार सिंह है।उसने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! आपके जीवन में ऐसी कोई घटना विशेष घटना जो प्रेरणादायक रही है और आप उसे गर्व से साझा करना चाहते हैं?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! हां,2016 तक मैं कुछ भी नहीं लिखती थी।बच्चे बड़े हो रहे थे उनको फेसबुक चलाते
देखकर मैंने भी उनसे अपना फेसबुक अकाउंट
बनवाया। शुरुआत में अच्छी अच्छी पिक शेयर
और लाइक करती थी।बड़े बेटे ने ही एक दिन
मेरे लिए ‘जीवनपथ’नाम से एक वेबसाइट बना
और बोला मम्मी आप फालतू समय बिताने के बजाय इस पर कुछ लिखा करो। शुरुआत में
डरते डरते कुछ कविताएं प्रेषित कीं और जब उसे लोगों ने पसंद किया तो लिखने का हौसला भी बढ़ा। बस यहीं से लिखना शुरू कर दिया था। सामाजिक विसंगतियों के प्रति आक्रोश भी
लिखने के लिए प्रेरित करता है।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! आपको क्या लगता है एक लेखक की कलम का उद्देश्य आत्मसुखाय चलना सही है या साहित्य और समाज कल्याण करते हुए?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! एक लेखक की कलम का उद्देश्य समाज
कल्याण की भावना ही होनी चाहिए। साहित्य
का प्रभाव हमेशा से ही समाज पर पड़ा है और
पड़ता है तथा पड़ता रहेगा। इसका उदाहरण
रामचरित मानस से ले सकते हैं। प्रेमचंद को
अपना आदर्श बना सकते हैं ।साहित्य में वह अथाह क्षमता है जिसके माध्यम से समाज में क्षीण होते जीवनमूल्यों में नवउत्साह का सृजन कर सकते हैं।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! आपकी रचनाओं में साहित्य की लुप्तप्राय समृद्ध शब्दावलियों के साथ-साथ आँचलिक भाषा का समन्वय मिलता है, आप इस पर क्या कहेंगे?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! सही कहा आपने मुझे देशज तथा सरल शब्दावलियों का प्रयोग करना अच्छा लगता है।अवध प्रान्त से जुड़े होने के कारण अवधी पसन्द है तो ब्रज भाषा के शब्द भी मुझे अपनी ओर सदा से ही आकर्षित करते रहे हैं।साहित्य में लुप्तप्राय शब्दावलियों तथा सहज आंचलिक भाषा के शब्दों को स्थान अवश्य दिया जाना चाहिए इससे एक तो वे प्रयोग में बनी रहेंगी दूसरा लोगों को हमारी बात और सहजता से समझ में आ सकेगी।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! एक साहित्यकार के रुप में आपके मित्र और परिवार के लोग आपको कितना पंसद करते है?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! अगर सच कहूं एक साहित्यकार के रुप में मेरे मित्रों ने मुझे बहुत आत्मबल प्रदान किया।
उनके कारण ही आज इस मार्ग पर चलने का
हौसला पा सकी हूं। मेरे एक फेसबुक मित्र संतोष ने ही अखबारों तथा साझा काव्यसंग्रह में लिखने के लिए रास्ता दिखाया ।परिवार के लोगों ने भी मुझे समय तथा प्रोत्साहन दोनों ही प्रदान किया किन्तु मेरा लिखना उन्हें उतना पसंद नहीं आता। उनको लगता है कि यही समय मुझे अपने स्वास्थ्य तथा घरेलू काम पर लगाना चाहिए।शायद उनकी दृष्टिकोण से उनकी यह सोच उचित हो।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रति आप क्या दृष्टिकोण रखते हैं? आपके विचार से साहित्य को और समृद्ध बनाने के लिए क्या क़दम उठाया जाना चाहिए?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! आधुनिक हिन्दी साहित्य में समर्पित लोगों की कमी नहीं है।इसे समृद्धि प्रदान करने के लिए हमें स्व छोड़कर परहित की भावना से साहित्य सृजन करना चाहिए। साहित्य प्रेमचंद
जैसा समर्पण चाहता है, समाज का हित ही
उनके लिए बहुमूल्य था। अर्थ की कामना
छोड़कर ऐसा साहित्य सृजित करें जो जन कल्याण करने में सक्षम हो तथा क्षीणकाय जीवन मूल्यों में अनुपम शक्ति का संचार कर सके।आज समाज के जीवनमूल्यों को एक संजीवनी शक्ति की परमावश्यकता है जो
हिन्दी साहित्य उसे प्रदान करने में सक्षम है।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! क्या अब तक आपकी कोई साहित्यिक पुस्तक प्रकाशित हुई है?यदि छपी है तो उसके विषय में भी कुछ बताएं।
डॉ. सरला: विज्ञात जी! हां, दो एकल काव्यसंग्रह -१-“जीवनपथ” तथा २-“आशादीप” प्रकाशित हो चुका है।एक एकल कहानी संग्रह- “मेरे जीवन का समर”तथा
एक शोधग्रंथ “आधुनिक पौराणिक प्रबंध कथाओं में पात्रों का चरित्र विकास” नाम से
प्रकाशित हो चुकी है।इसके अलावा 25से अधिक सांझा काव्यसंग्रह तथा कहानी संग्रह में
भी मेरी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। आगामी
एकल काव्य संग्रह -“मेरी कुछ कुण्डलियां”शीघ्र
ही प्रकाशित होने वाली है।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! जो नए लेखक या कवि आ रहे हैं उनके लिए आपका दृष्टिकोण? उनके लिए क्या सन्देश देना चाहेंगे?
डॉ. सरला: विज्ञात जी! आज जो नये लेखक व कवि आ रहे हैं उनमें सीखने की ललक तथा अपार ऊर्जा है। कुछ लोग साहित्य को धन अर्जित करने का साधन मान लेते हैं । मंचों से मनोरंजन की वस्तु बनाने में तनिक भी संकोच नहीं करते।इसकी अपनी
एक विशिष्ट गरिमा है। नये साहित्यकार अपनी ऊर्जा का प्रयोग सकारात्मक सोच से करें,स्व को छोड़कर परहिताय साहित्य सृजित करें तो
हिन्दी साहित्य का यह आधुनिककाल विशिष्ट
स्थान प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है।
विज्ञात: डॉ. सरला जी! हमारे लिए कोई दिशा निर्देश देना चाहें तो स्वागत है।
डॉ. सरला: विज्ञात जी! आपका मैं दिल से सम्मान करती हूं।आपके द्वारा हिन्दी साहित्य को आगे बढ़ाने में जो योगदान दिया जा रहा है वह सराहनीय तथा अनुकरणीय है। आपसे यही निवेदन है की आप सदा ही नवांकुरों का साहित्यिक पथ इसी तरह प्रशस्त करते रहें।