तेरी कुर्बत में लगता हमारा है सब।
सादगी है सलामत तेरी चाल में..
धान की खुशबुओ सी महक बाल में
फूल के पंखुड़ी सा तुम्हारा बदन ।
गेसुओं में समेटे हो जैसे गगन।
तुमको देखा तो तितली ग़ज़ल हो गई।
और ग़ज़ल चाहतों की पहल है गई।
ये पहल ऐसी जैसी हो वन में हिरण
और हिरण के ही आंखो से निकली किरण।
वो किरण जिसके जद में किनारा है सब।
तेरी कुर्बत में लगता हमारा है सब।
इक नदी के किनारे में हम आ गए…..
जुगनुओं को जो देखा तो घबरा गए।
तेरी आंखों के मस्ती में हम छा गए।
तुमने सोचा था शायद तो हम आ गए।
आते आते इबादत ने ले ली जनम।
खुशनुमा रंगतों से सजे आज हम।
मेरे चाहत में अंगड़ाई आने लगी।
ख़्वाब में आप आ,गुदगुदाने लगी।
होठ गाने लगे हैं तराने नए।
अहल ए उल्फ़त ये देखो नज़ारा है सब।
तेरी कुर्बत में लगता हमारा है सब।
दीपक झा रुद्रा