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12 May 2025 · 1 min read

नवनिधि क्षणिकाएँ---

नवनिधि क्षणिकाएँ—
12/05/2025

ये मन की घुटन
कब तक सहें बताओ,
कहने से मन डरता भी है।

आक्रोश उचित था
कौन भला चुप रहे ऐसे में,
मेरे अपने छीने थे उसने।

चाँदी की दीवारों में
सोने के खंभे थे,
लेकिन मन से कंगाल था।

इन्हीं आकांक्षाओं ने अब तक
रूकने नहीं दिया मुझे,
पाँव घिसकर ठूँठ हो गये।

सच्चाई मुझे पता है
तुम्हारे रूठने का कारण,
मुझे तुमसे न छीन ले कोई।

अपनी औकात से बाहर था वो
अच्छा जरूर लगता था पर,
कुछ दूरियां भी करनी पड़ी।

मेरे अपने नियम हैं
तुम्हारे कुछ अलग ही,
ऐसे में कैसे मेल हो।

— डॉ. रामनाथ साहू “ननकी”
संस्थापक, छंदाचार्य, (बिलासा छंद महालय, छत्तीसगढ़)
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