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11 May 2025 · 3 min read

ऐतिहासिक सैन्य प्रेस कॉन्फ्रेंस और पारदर्शिता की मिसाल: अभिलेश श्रीभारती

अभी शाम करीब 1 घंटे से बैठकर मैं सेना संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को सुन रहा था।
तीनों सेनाओं – थल सेना, वायु सेना और नौसेना – ने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देशवासियों को एक स्पष्ट और सटीक जानकारी दी कि हाल ही में दुश्मन देश पर की गई कार्यवाही कितनी प्रभावशाली रही। एक-एक तथ्य, एक-एक शब्द, तकनीकी प्रमाण, सैटेलाइट इमेज, वीडियो फुटेज और ग्राउंड रिपोर्ट – सब कुछ सार्वजनिक किया गया। सेना ने बताया कि दुश्मन के कौन-कौन से ठिकानों को निशाना बनाया गया, किस तरह के हथियार इस्तेमाल हुए और क्या परिणाम मिले।

इतना ही नहीं, सेना के वरिष्ठ अधिकारी और DGMO ने यह भी बताया कि पाकिस्तान की तरफ से आधिकारिक हॉटलाइन पर संपर्क कर युद्धविराम की अपील की गई, मतलब सीधा और साफ की पाकिस्तान ने शीश फायर की भीख मांगी की बापू अब बस करो।
यानी सीधे शब्दों में – दुश्मन की कमर तोड़ दी गई।

यह एक ऐतिहासिक सैन्य सफलता थी, और हर देशवासी को गर्व होना चाहिए था। लेकिन देश के भीतर ही कुछ ऐसे लोग भी सामने आए जो सेना की इस स्पष्ट, सटीक और प्रामाणिक रिपोर्ट पर सवाल उठाने लगे।

जब शक देश के दुश्मन पर नहीं, बल्कि अपनी सेना पर हो

सेना ने जो कहा, वह सबूतों के साथ कहा। लेकिन कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और शहरी “तटस्थतावादी” लोग कहने लगे – “अगर हमला हुआ होता, तो पाकिस्तान में जश्न क्यों मनाया जा रहा है?”
कुछ ने सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के न्यूज़ चैनलों के स्क्रीनशॉट साझा कर यह जताने की कोशिश की कि पाकिस्तान ने इस ऑपरेशन को नकार दिया है, इसलिए शायद हमला हुआ ही नहीं।
अरे भाई आप ने माफ कर दिया तो जश्न नहीं मनाएगा।
बड़े बुड़बक आदमी हो कुछ भी सवाल करने लग जाते हो?

प्रश्न ये है – दुश्मन देश की भाषा में बोलना क्या अब तथ्यों की जांच पड़ताल बन चुकी है?

क्या भारत की सेना, जो दशकों से देश की रक्षा करती आई है, अब उन लोगों की नज़र में संदिग्ध हो चुकी है जिनके घर उसकी वजह से सुरक्षित हैं?

अब अगला सवाल की झूठ का अड्डा बना पाकिस्तान

पाकिस्तान वह देश है जो आधिकारिक रूप से इतिहास को तोड़-मरोड़ कर अपने स्कूलों में बच्चों को यह पढ़ाता है कि भारत से लड़ी गई चारों जंगों में पाकिस्तान विजयी रहा।
वह देश जो आज भी चीन को “गधे” निर्यात करता है और इस पर गर्व करता है, वहाँ का मीडिया और वहाँ का प्रचार तंत्र किसी प्रकार की सच्चाई का वाहक हो सकता है क्या?

ऐसे देश की जनता, जो सैन्य हार के बाद भी सड़कों पर नाचती है, वह उनके राजनीतिक और मानसिक दीवालियेपन का परिचायक है – न कि किसी जीत का।

सेना के पास है सटीकता, देश के भीतर फैला है संशय

सेना की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जितनी स्पष्टता थी, शायद ही किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसा देखने को मिलता है।
कहा गया:

>कौन-से टारगेट पर अटैक किया गया
>किस समय कार्रवाई हुई
>किस टाइप के हथियार और तकनीक का इस्तेमाल किया गया
>कितने लोग हताहत हुए
>और सबसे महत्वपूर्ण, किस तरह से पाकिस्तान की सेना खुद बातचीत के लिए मजबूर हुई

पर हैरानी की बात यह है कि देश के ही कुछ लोग, बिना किसी प्रमाण के, पाकिस्तान के सोशल मीडिया पोस्ट्स के आधार पर सेना की बातों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

देशभक्ति की परिभाषा को फिर से सोचने की ज़रूरत

सेना न तो किसी राजनीतिक दल की संस्था है, न कोई प्रचारक।
सेना एक अनुशासित, पेशेवर और निस्वार्थ बलिदान देने वाली व्यवस्था है।
उसके बयान का हर शब्द राष्ट्रहित में होता है। उस पर प्रश्नचिन्ह लगाना, केवल सेना का अपमान नहीं, देश के आत्मसम्मान का भी अपमान है। मुझे तो कभी-कभी

अपने गिरेबान में झाँकिए, पाकिस्तान की दीवारों पर नहीं

जब सीमा पर हमारे जवान अपनी जान हथेली पर रख कर देश की रक्षा करते हैं, तो उनका मनोबल हमारी बातों से तय होता है।
सेना पर सवाल उठाने से पहले ये सोचना ज़रूरी है कि हम क्या संदेश दे रहे हैं – दुश्मन को ताकत या अपनी सेना को समर्थन?

देश की सच्ची सेवा यही है कि जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, तो हम एक साथ खड़े हों – मतभेद के बिना, संदेह के बिना, और पूरी निष्ठा के साथ।

“जिनके सीने में देश है, वो कभी भी दुश्मन की झूठी तस्वीरों में सच्चाई नहीं तलाशते।”

नोट: यह लेखक की अपने निजी विचार हैं।

✍️ आलेख साभार ✍️
अभिलेश श्रीभारती
सामाजिक शोधकर्ता, विश्लेषक, लेखक

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