दोहा सप्तक. . . . . संबंध
दोहा सप्तक. . . . . संबंध
भौतिक युग के हो गए, भौतिक सब संबंध ।
ठहरे पानी सी लगे , इन में अब दुर्गन्ध ।।
फेरे लेकर अग्नि के, कसमें खाईं साथ ।
छोड़ दिया फिर अहम के,कारण अपना हाथ ।।
संबंधों में बेवजह, बढ़ने लगे तनाव ।
पल में रिश्ता तोड़ते, चाहें नहीं झुकाव ।।
संबंधों का टूटना, आज आम है बात ।
अब तलाक के शूल से, आहत है हर रात ।।
मनमुटाव इतने बढ़े , टूट गए संबंध ।
जीवन सूना हो गया, बिखरी पावन गंध
अवसर जीने के नहीं, मिलें कभी दो- चार ।
तोड़ अहम का झुनझुना, खुश- खुश इसे गुजार ।
गठबंधन के धर्म को, सदा निभाना यार ।
छोटी-छोटी बात को, मत देना विस्तार ।।
सुशील सरना / 11-5-25