ना जाने क्यों------- ?
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ना जाने क्यों———- ?
तुमसे मेरी प्रीत कम क्यों नहीं हुई,
जबकि हमको बिछुड़े हो गये इतने वर्ष,
मुझको आज भी ऐसा लगता है,
जैसे कि तुम मेरे सामने मेरे करीब हो
जबकि मुझको यह तक मालूम नहीं,
कि तुम कहाँ और किसके साथ हो।
ना जाने क्यों———— ?
आज भी तेरा नाम,
रहता है हरवक्त मेरे लबों पे,
मौजूद है आज भी मेरी आँखों में,
तेरी तस्वीर एक सपना बनकर,
आज भी धड़कती है तू ,
मेरे हृदय में मेरी धड़कन बनकर,
और निकलती है मेरी रूह से जो आवाज,
वह सिर्फ तुमको ही पुकारती है।
ना जाने क्यों———–?
जबकि देखी है मैंने यहाँ,
तुमसे भी ज्यादा हसीन सूरतें,
और होकर भावुक मैं,
करने लगा था उनसे प्यार,
उनको तुम जैसा समझकर,
ताकि तुमको भुला दूँ मैं दिल से,
लेकिन मुझ पर असर था,
उनसे ज्यादा तेरी छवि का,
और नहीं लिख सका मैं,
उनका नाम अपने खूं से।
ना जाने क्यों——- ?
आज भी मानता हूँ मैं,
मेरी तरहां तुमको पवित्र,
तुमसे बातें करने को बेताब हैं मन,
अपने सफर का साथी तुमको मानकर,
हालांकि अब मैं जी.आज़ाद हूँ ,
और नहीं बंधना चाहता हूँ मैं,
अब किसी भी बन्धन में,
फिर भी मुझको इंतजार है किसी का,
तुम ही बताओ किसका इंतजार होगा ?
शिक्षक एवं साहित्यकार
गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)