घर के कोनों से लेकर
घर के कोनों से लेकर
विशाल जीवन के अंतहीन ठहराव तक
माॅं की अनुपस्थिति
हर पल एक सुन्न सी वेदना को जीवंत कर देती है!
माॅं का न होना
यथार्थ की भयावहता को बढ़ा देता है!
रश्मि ‘लहर’
घर के कोनों से लेकर
विशाल जीवन के अंतहीन ठहराव तक
माॅं की अनुपस्थिति
हर पल एक सुन्न सी वेदना को जीवंत कर देती है!
माॅं का न होना
यथार्थ की भयावहता को बढ़ा देता है!
रश्मि ‘लहर’