दोहा पंचक. . . . विविध
दोहा पंचक. . . . विविध
धीरे-धीरे हो गए, पीत वृक्ष के पात ।
शाखाएं अब सह रहीं, तीव्र ताप आघात ।।
पथिक ढूँढता छाँव को, पंछी ढूँढे ठौर ।
कदम – कदम पर वृक्ष का, बीत गया अब दौर ।
लँगड़ा दौड़े दौड़ में, गूँगा गाए गीत ।
बहरों की सब टोलियाँ, चलें दिशा विपरीत ।।
हरित पात ओझल हुए, पर्णहीन हर डाल ।
कैसे अब छाया मिले, सबसे बड़ा सवाल ।।
ऐसे ही होता रहा, वृक्षों का व्यापार ।
धरती भीषण ताप से, होगी फिर अंगार ।।
सुशील सरना / 10-5-25