ख्वाहिशों में बसा वो घर, अब अजनबी सा लगता है,
ख्वाहिशों में बसा वो घर, अब अजनबी सा लगता है,
यादों से भरा वो शहर भी, मतलबी सा लगता है।
साँसों में घुलती हवाएं, घुटन की वजह बनकर मिलती हैं,
जो महफिलों अपनों की हों तो, अब डर सा लगता है।
पगडंडियां मिलती नहीं, सड़कों से वो गुम हो जाती हैं,
ये ख्याल मंजिलों का भी, अब तो कहर सा लगता है।
छाँव गुलमोहर की धुप संग, साजिशें कर आती हैं,
मेरे हिस्से में बरसता सुकून भी, उनको ज़हर सा लगता है।
ओस चुभती है आँखों को, रात यूँ रोकर चली जाती है,
फूलों की रुसवाइयों से, ये बसंत भी पतझड़ सा लगता है।
दहलीजों की बेवफाइयों, जज़्बातों को बेघर कर देती हैं,
अब दुआएं मांगता वो जलता दीया, भी बेअसर सा लगता है।
ख्वाहिशों में बसा वो घर, अब अजनबी सा लगता है,
यादों से भरा वो शहर भी, मतलबी सा लगता है।