"फ़साना" ग़ज़ल
नज़र उसको मुझसे बचाना भी है,
मुझी पर मगर हर निशाना भी है।
तग़ाफ़ुल भले रास आया उसे,
मगर महज़बीं से निभाना भी है।
हवाले हैं मौजों के सब हसरतें,
तलातुम पे अब मुस्कुराना भी है।
शरीके-सफ़र, अब हैं तनहाइयाँ,
गले उनको दिल से, लगाना भी है।
मैं लूँ चूम कैसे, गुलाबी वो लब,
गड़ी मुझपे, नज़रे-ज़माना भी है।
कहो साहिलों से, रहें दूर अब,
समन्दर मेँ मुझको समाना भी है।
हक़ीक़त तो शेरों मेँ कर दी बयाँ,
सुनाने को पर इक फ़साना भी है।
हसीं शाम, आहट मेँ सरगोशियां,
क्या सच मेँ, उसे आज आना भी है।
ठहर जाऊँ “आशा” सरे-शाम क्यूँ,
अभी तो बहुत दूर जाना भी है..!
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