जब द्वंद्व मेरे मन के सारे चैन ओ सुकून हर लेता है
जब द्वंद्व मेरे मन के सारे चैन ओ सुकून हर लेता है
इस जीवन के हर सुख का क्षण बंधक, कैदी कर लेता है व्याकुलता बढ़ती है जब तब प्रतिशोध मैं इससे लेती हूँ
जो इस मन के दोषीजन हैं, कब श्राप मैं उनको देती हूँ