दोहा पंचक. . . . माधुर्य
दोहा पंचक. . . . माधुर्य
आपस के माधुर्य को, हरते कड़वे बोल ।
ऐसे अवसर का कड़ा, पड़े चुकाना मोल ।।
शब्दों को मत दीजिए , कड़वाहट का रूप ।
आपस के माधुर्य की, ढले न मीठी धूप ।।
सोच समझकर बोलना, अंतस के उद्गार ।
बिखर न जाए बोल से, जीवन का शृंगार ।।
आपस के व्यवहार का, शब्द बनें आधार ।
कड़वाहट को त्यागिए,करो प्रेम विस्तार ।।
शब्दशरों से जो लगे, मिटते नहीं निशान ।
जीवन भर वो दर्द की, बनते हैं पहचान ।।
सुशील सरना / 8-5-25