संवेदना
क्यों तुम छोड़ चली दुनिया क्या मुझसे कोई भूल हुईं
प्रकृति के उपवन की बगिया चुभ जाए वह शूल हुईं
प्राणों से खेली थीं या जीवन में सखी विरह हुआ था
व्याधि प्रबल थीं या जीवन में तेरे कुछ कलह हुआ था
फैला हुआ क्षितिज की रेखा विरह वेदना भर देता हैं
बीजक की प्रबंधन प्रणाली शून्य शून्य से कर लेता हैं
गले में वाणी रुकी हुई हैं आँखों में आँसू भर जाता हैं
जीवन में जीवन जीने पर सखी तेरे बीन मर जाता हैं
प्राण कलेवर में अटके हैं मन तेरे साथ में चल जाता हैं
साथ ले जाती मुझे सखी भी ना मुझसे अब कल भाता हैं
खेल खेलता विधि विधाता ना उनसे कोई लड़ पाता हैं
सत्य जान सात्त्विकता में मानव ही बन जड़ जाता हैं
हृदय भरीं जो भाव वेदना वहीं प्रवाहित कर जाता हैं
आश्रम में जो बनी व्यवस्था ठहर ठहर वह डर जाता हैं
तुझे पुकारे बाखर की तुलसी सूखा पता सा झड़ जाता हैं
सुगंध पुष्प से श्रृंगारित बगिया मानों अग्नि वह बर साता हैं
जीवन के सफ़र सरोवर में तिमिर सघन बन जल उठता हैं
दुःख की पीड़ा मन की वेदना रह रह कर हर पल उठता हैं
इंजी. नवनीत पाण्डेय सेवटा चंकी