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7 May 2025 · 3 min read

#संस्मरण

#संस्मरण
■ एक काली रात की उजली सौगात
★ अदबी सफ़र के 38 साल हुए मुकम्मल
★ आज मेरी शायरी की 38वीं सालगिरह
(अदब के सफ़र में आपके साथ और सहयोग को सलाम, आज एक बार फिर)
【प्रणय प्रभात】
आज 07 मई 2025 का दिन मेरे लिए बेहद ख़ास है। जी हाँ, आज मेरी शायरी की 38वीं सालगिरह है। वर्ष 1987 में आज ही के दिन इस दिल की ज़मीन पर उर्दू अदब का पहला बीज अंकुरित हुआ था। आज ही के दिन श्योपुर मेले के रंगमंच पर पहली बार अखिल भारतीय मुशायरा पहली बार सुना था। इस दिन तक उर्दू को लेकर न कोई रुचि थी न समझ। बस एक रात काटने की मंशा से जा बैठे थे मुशायरे में। वो भी इसलिए कि मोहल्ले में बिजली नहीं थी उस रात।
शुरुआत में न कुछ पल्ले पड़ना था न पड़ा। इसके बाद जैसे ही नाज़िमें-मुशायरा डॉ बशीर बद्र साहब अपने रंग में आए, उर्दू
ज़ुबान अपनी सी लगने लगी। लगा कि इससे जो डर था उसकी कोई वजह ही नहीं थी। ख़ानदान में बाबा, पापा दोनों उर्दू के अच्छे जानकार थे। इस नाते भी उर्दू ख़ून में थी। बस उससे रूबरू होने का मौका इससे पहले नहीं मिला था मुझे। अलसुबह तक चले मुशायरे में पद्मश्री डॉ बशीर बद्र के अलावा अदब की दुनिया के नामी शायर डॉ राहत इंदौरी, डॉ सागर आज़मी, अख़्तर ग्वालियरी, इम्तियाज़ जयपुरो, राही शहाबी, एजाज़ पापुलर मेरठी, मोहतरमा तस्नीम सिद्दीक़ी और शांति सबा मंच पर थीं।
आधे से ज़्यादा क़लाम आसानी से समझ आया। बाक़ी साथ ले गए अज़ीज़ दोस्त और वरिष्ठ शायर शाकिर अली “शाकिर” की मदद से समझा। उर्दू का जादू अब हिंदी रचनाकार के सर पर चढ़ कर बोल रहा था। मौसी भी माँ सी ख़ूबसूरत और मीठी हो सकती है, उस एक रात के चंद घण्टों में जाना। प्रोग्राम ख़त्म होने के बाद डायरी ले कर मंच पर चढ़ा। डॉ बद्र से ऑटोग्राफ़ मांगा। वो बड़े ख़ुलूस से मिले। मुस्कुराए और खुले हुए पन्ने पर अपने दस्तख़त के साथ लिखा यह शेर-
“कुछ तो मजबूरियां रही होंगी।
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।।”
अगले ही दिन जनाब शाकिर साहब से ग़ज़ल, नज़्म, क़तात, शेर के बारे में समझने का प्रयास किया। एक ग़ज़ल की बंदिश, रदीफ़, क़ाफ़िए के बारे में जाना। शाम होने तक बहुत कुछ लिख भी दिया। बतौर उस्ताद शाकिर साहब ने इस्लाह की। अदब के सफ़र का आगाज़ हो चुका था। जो आज तक बदस्तूर जारी है। जीवन के इस दो तिहाई हिस्से ने तमाम तजुर्बे दिए। नतीज़तन आज उर्दू अदब की ज़्यादातर विधाओं से मेरा सीधा वास्ता है। लग्भग हर सिंफ़ में लिखा है। लिख रहा हूँ आज तक। क़लाम कभी सैकड़ों में था, अब हज़ारों में है। दुआएं हैं आप की, इनायतें और नवाज़िशें भी। आगे भी हमवार बने रहेंगे तो सफ़र दिलचस्प बना रहेगा।
तीन दशक से अधिक की इस आदबी यात्रा में दौलत, शौहरत जैसी आरज़ी मंज़िल बेशक़ दूर रही हो, मगर दिली सुक़ून की भरपूर दौलत से मालामाल रहा हूँ मैं।
आप जैसे अच्छे दोस्त हमक़दम रहे हैं हमेशा से।
शुक्रगुज़ार हूँ आपकी बेपनाह दुआओं, इनायतों, नावाज़िशों और मुहब्बतों के लिए। बाक़ी के दोस्तों से गुज़ारिश है कि उर्दू से परहेज़ नहीं प्यार करें। थोड़ी सी कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि ये आपकी अपनी ज़ुबान है। जो आपकी तहज़ीब को कुछ और निखार देती है। शुक्रिया इस शीरीं जुबान का।
चलते-चलते बताता चलूं कि तमाम मंचीय कार्यक्रमों से जुड़ाव के बावजूद शायरी मेरी रोज़ी-रोटी नहीं रही। मैने गीतों को बेटों की तरह पाला तो ग़ज़लों और नज़्मों को बेटियों की तरह। यह मेरे लिए जरिया बनी दिल-दिमाग़ से बोझ उतारने का। मन को हल्का करने का भी। ठहराव और रफ़्तार से लेकर उबाल तक से लबरेज़ है मेरी शायरी। तभी शायद कभी कहना पड़ा मुझे-
“मुझे सोते हुए जगते हुए ये ख़्वाब आता है,
कभी पानी की जगहा आंख में तेज़ाब आता है।
मैं बेहतर जानता हूँ इसलिए अक़्सर उफनता हूँ,
समंदर मौन रहता है तो फिर सैलाब आता है।।”
संस्मरण पर विराम लगाने से पहले बताता चलूं कि इस सालाना लेख (संस्मरण) में कभी कुछ नहीं बदलेगा। सिवाय इस एक नए तथ्य के, कि कल (5 साल पहले तक) मेरे पास अपनी एक आवाज़ थी, जो आज नहीं है।
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संपादक/न्यूज़&व्यूज
श्योपुर (मध्यप्रदेश)
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