Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
7 May 2025 · 1 min read

"अनपेक्षित" / कुमार राजीव


“अनपेक्षित”
जैसे
अचानक
छंट जाऐं बादल
हो जाए , आलोक

आंखें मींचे
बैठे फकीर
के पात्र में
कोई गृहणी
धीरे से
रख जाए
नर्म गर्म पुए

भबक के
जल उठें
चूल्हे में
गीली लकड़ियां

मार्च
के महीने में
एकाएक
बरस पड़ें मेघ
झूम उठें
गेहूं की सुनहली
बालियां

मीठे
निकलने लगें
सभी खरबूज़े

सिहर उठे
कोई नवयौवना
पहले
प्रेम स्पर्श से

अपने सा
स्पष्ट
दिखने लगे
ईश्वर . . .

तो
मान लेना . .

प्रेम सांस
ले रहा है
तुम में . . .

२.

” दुःख्म सु :ख्म ”

सुख
को पुकारा . . .

धत्ता बताते
ठुमक चलता
आया दुख . . .

धप्प से
चढ़ बैठा गोद में
चूसने लगा
पलकों से नमक
खींच के
मेरी एड़ी का गढ़ा कांच
लगा बकोसने चबर चबर . . .

मेरे ज़रा सा हिलते ही
बोल उठा, खिलंदड़ा

इस गर्मी में ठंडा – वंडा
नको रे बाबा . . .

चाय चढ़ाओ
काफ़ी बनाओ
मस्त पिलाओ

लोहे को
काटेगा
केवल
लोहा ही . . . ।

~ कुमार राजीव

Loading...