Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
6 May 2025 · 1 min read

रिमझिम बूंदें बरस रही है

रिमझिम बूंदें बरस रही है
उस पर मेरा भीगा मन।
तरसी रहा है पिया मिलन को
तड़प रही मैं बिरहन।
सहम जाऊं,और डरूं मैं
गरजे जब काले काले घन।
बिजली भी जब जब कौंधी
तन में हुई अजब सिरहन।
राह तकूं मैं कन्हैया की
विरह में भयी मैं जोगन।
अब तो कान्हा गले लगा ले
दरस को तरसे प्रेम पुजारिन।

सुरिंदर कौर

Loading...