रिमझिम बूंदें बरस रही है
रिमझिम बूंदें बरस रही है
उस पर मेरा भीगा मन।
तरसी रहा है पिया मिलन को
तड़प रही मैं बिरहन।
सहम जाऊं,और डरूं मैं
गरजे जब काले काले घन।
बिजली भी जब जब कौंधी
तन में हुई अजब सिरहन।
राह तकूं मैं कन्हैया की
विरह में भयी मैं जोगन।
अब तो कान्हा गले लगा ले
दरस को तरसे प्रेम पुजारिन।
सुरिंदर कौर