खता किसकी ?
खता चाहे किसकी भी हो ,
मगर सजा मुसाफिरों को मिली ।
जाने किस मनहूस घड़ी में,
जिंदगी मौत से जा मिली ।
एहसास करवा दिया फिर से ,
ए मौत ! तू बड़ी बेदर्द निकली ।
न ही उम्र का लिहाज किया तूने ,
कितनी कलियां हाथों से मसली ।
कितने अरमान और ख्वाब सजे थे ,
उन आंखों की रोशनी छीन ली ।
रिश्ते नाते ,मुहब्बत और प्यार ,
तूने इनसे हर बाजी छीन ली ।
ए मौत ! तूने यह क्या किया ?
इतने घरों को उजाड़कर ,
तुझे भला कौन सी खुशी मिली ?
किसी की आंखों में आंसू ,
कितने लबों पर दर्द भरी आह ।
आज तकदीर भी हाय! बेवफा निकली ।
हम इंसानों की तो कोई हैसियत ही नहीं,
जब भी उड़ना चाहा ,पैरों में सदा जंजीर मिली ।
तेरा तो साया बना रहेगा हमारी जिंदगियों पर ,
गनीमत है जितनी भी मिली सांस ,खूब मिली ।
अब तुझसे हम करें शिकवा भी क्या ! इस जुल्म का ,
हम तो है ही कठपुतलियां ! मगर ,
तेरी डोर भी उस पवार दीगर से है मिली ।