संवेदना का प्रवाह
ए जिंदगी शुरू हुआ नहीं कि तेरी जिंदगी सिमट गई
क्या गुनाह था मेरा जो मेरी यह जिंदगी ही मिट गई
ए सखी यह खेल कैसा खेला तुने प्रकृति के साथ में
अधूरे में मुझे क्यूँ छोड़ दिया अप्रकृति के हाथ में
श्रृंगार से श्रृंगारविहीन प्रकृति कर गई
बीच सफर में अकेला छोड़ क्यूँ मर गई
क्या मेरा दोष था क्या मेरा गुनाह था
तोड़ कर वादा सारा छोड़ा मेरा राह था
विवेक भी अविवेक में परिवर्तित होता जा रहा
यह भाव सारे तेरे साथ में प्रवाहित होता जा रहा
शून्य में सुषुप्त हो शून्य में सिमट रहा
प्रभा के प्रकाश में तिमिर भी विकट रहा
संस्कृति के सार में तूफान भी निकट रहा
संताप के स्वीकार का प्रसाद भी प्रकट रहा
खो दिया हूँ बीजक प्रबंधन खो दिया संसार हूँ
सभ्यता में खो दिया अपनपा हुआ विकार हूँ
अफसोस सारे जिंदगी भर बोझ बनकर रह गया
आखरी तेरे शब्द ने अपना कहकर कह गया
बोलो कहों आगे कुछ सुन लु हृदय पिए
क्या बताऊँ आपको बुझा दिए सारे दिए$2