चने की रोटी
चने की रोटी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है, अनेक पोषक-तत्वों एवं गुणों से भरपूर जैसे उच्च प्रोटीन, रिच फाइबर, लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स, ग्लूटेन फ्री, वजन घटाने मे सहायक, आयरन और फोलिक एसिड का अच्छा श्रोत और हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है। 1960 के दशक तक हमारे देश मे प्रमुख आहार मोटे अनाज ही होते थे। गेहूं का इस्तेमाल तीज-त्यौहार पर या मेहमानों के आने पर ही किया जाता था। इसी दशक मे अमेरिका मे गेहूं क्रांति हुई वहां से उच्च उपज वाले बीज भारत आये जिन्हे हरित क्रांति के जनक डा. एम एस स्वामीनाथन ने सफलतापूर्वक उगाया। चूंकि इसकी उपज ज्यादा थी किसानों ने मोटे अनाज को छोड़ गेहूं को उगाना शुरू कर दिया और हमारी थाली से सेहत का खजाना लुप्त हो गया। अब एक बार फिर उसी अमेरिका से गेहूं से स्वास्थ्य को हानि पहुंचने के कारण इसके बायकाट की खबरें आने शुरू हो चुकी हैं।
मेरे ताऊ जी जो हमारे संरक्षक भी थे जिनका बहुत सम्मान करता और मान रखता था को 60 वर्ष की आयु मे डायबिटीज हो गया, डाक्टर ने अन्य परहेज के अलावा गेहूं की रोटी पर रोक लगा दी। चूंकि उनकी देखरेख का जिम्मा मेरे उपर था इसलिए घर की रसोई से गेहूं,चावल और आलू हटा कर जौ चना, दलिया एवं हरी सब्जी रख दी ये सोंच कर कि न घर मे बनेगी ना ताऊ जी का खाने का मन करेगा। तब से स्थायी रुप से घर मे जौ-चने की रोटी का ही चलन हो गया। 10 वर्षों तक रोगग्रस्त रहने के पश्चात वो स्वर्ग सिधार गये। तो रसोई के नियमों मे भी सिथिलता आ गई, लेकिन ये ज्यादा दिनों तक कायम न रह सका क्यों कि मेरी मां को डाक्टर ने प्रिडायबिटिक करार दिया और परहेज की सलाह दी। अब तक मैने जौ चने के आटे मे सोयाबीन भी मिलाने की युक्ति ढ़ूढ ली थी, अनुपात था जौ चना सोयाबीन 6:3:1, बस इसी अनुपात मे अनाज लेकर चक्की मे पिसवा कर घर आने लगा। खैर साहेब, मेरी मां ने भली-भांति परहेज किया नतीजतन ताउम्र उन्हे डायबिटीज नहीं हुई। मुझे भी ये रोटी बहुत पसंद आई इतना कि गेहूं के आटे की रोटी मुझे अच्छी ही नही लगती। इसका फायदा भी हुआ कि अब मै बानप्रस्थ आऋम मे पहुंच चुका हूं मुझे डायबिटीज नहीं हुई।
बच्चों की शादी-ब्याह हो गया, लड़कियां अपने-अपने घरों मे खुश, लड़का बहू के साथ जहां वो जाब मे था वहीं सेटल हो गया। हम दोनो मियां बीबी अपने शहर मे निजी आवास मे अपना रिटायर्मेंट इंजाय कर रहे थे। लेकिन ये खुशी ज्यादा दिनों तक बरकरार न रह सकी। अचानक पत्नी की तबियत खराब हुई और दो महीने के अंदर ही वो बीमार पड़ी हास्पिटल मे रहीं, स्वर्गवासी हुई और उनकी तेरहवीं भी हो गई। उनके न रहने के बाद अकेला पड़ गया सो लड़के के साथ रहने चला आया। कुछ दिनो तक तो मेरा ठीक-ठाक ख्याल रक्खा गया मेरी मन पसंद चीजें जिनमे चने की रोटी भी शामिल खिलाई गई। लेकिन ये सब बहुत जल्द तहस-नहस हो गया। मेरी पसंद को दरकिनार कर मेरे सामने वही परोसा जाता जो बहू रानी बनाती। एक-दो बार लड़के से कहा भी बेटा मुझे गेहूं की रोटी नही अच्छी लगती मेरे लिए चने का आटा ला दो। लेकिन वो ठहरे अस्त-व्यस्त मेरी बात आई गई हो गई।
अभी कुछ दिनों पहले दैवयोग से बड़ी बेटी के घर दिल्ली आने का सौभाग्य मिला। शालीनता से स्वागत सत्कार सहजता से स्वीकार हुआ। बेटी के दो संताने एक बेटी आरोही बी टेक तृतीय वर्ष जो बड़ी है एवं बेटा शिखर इंटरमीडिएट छोटा है के साथ दामाद जी भी सम्मान देतें है। मुझे अच्छा लगता है और मैं मन ही मन इन सब की भूरि-भूरि प्रसंशा करता हूं। यहां आये हुए मुझे दो तीन दिन हो चुके है, खाने मे गेहूं की रोटी जिसे मैं सुरुचिपूर्ण मन लगा के नही खा रहा इस बात को बेटी ने भांप लिया। उसी शाम बेटी-दामाद बाजार गये। दूसरे दिन खाने मे मेरी थाली मे चने की रोटी थी, जिसे देखकर मेरी आंखे भर आई। मन से ढेरों आषीश निकले। बेटी ने बिना कहे मेरे मन की बात समझी और बेटे ने कहने बाद भी बात पर ध्यान नहीं दिया। हालाकि बेटियां भी दामाद के अंडर में ही रहती है लेकिन बेटे बहू के अंडर मे इतना कि …..