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5 May 2025 · 11 min read

नेकी और बदी

सुभाष भगत अपने इलाके के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक थे। जाति भले ही उनकी उच्च नहीं थी लेकिन ऊंची जाति वाले में इनकी बहुत पूछ थी । वे लोग अपने पार्टी-फंक्शन में उनको जरूर बुलाया करते थे। उनके पास धन-दौलत काफी थी लेकिन समाज में इनकी प्रतिष्ठा इनके व्यक्तिव के कारण था। अपने विचार-व्यवहार में सादगी और सहजता देखते बनता था । उनके आगे-पीछे करनेवालों की भीड़ लगी रहती थी क्योंकि थाना फारी से लेकर कोर्ट कचहरी तक का काम लाचार और गरीब लोगों का करवाने के लिए हरदम तत्पर रहते थे। कड़की के दिनों में गरीब- गुरबों की मदद करने में एवं लड़की की शादी-विवाह में आर्थिक मदद करने में कभी नहीं हिचकते थे।
सुभाष भगत के दो पुत्र थे -विकास भगत और नीरज भगत।विकास और नीरज दोनों के जन्म में पांच साल का अंतर था। विकास के जन्म के दो साल बाद सुभाष भगत को एक बच्ची हुई थी जो जन्म के दो महीने के बाद ही डायरिया के कारण काल कलवित हो गई।उसके बाद नीरज का जन्म हुआ था। लेकिन विकास और नीरज को देखने पर दोनों ज्यादा बड़ा छोटा नहीं दिखता था।
दोनों का लालन-पालन उन्होंने समुचित ढंग किया। बड़ा बेटा,विकास, अपनी इच्छा के अनुसार स्नातक तक पढ़कर प्रतियोगिता परीक्षा पास करके राजस्व अधिकारी के पद पर काम करने लगा । दूसरा लड़का,नीरज,को इन्टर के बाद पढ़ने के लिए बाहर भेजना पड़ा| उसका जिद था कि वह घर पर भैया की तरह रहकर नहीं पढ़ेगा।
इन्टर के बाद इंजीनियरिंग की एंट्रेंस परीक्षा में नीरज दो बार सम्मिलित हुआ लेकिन उतीर्ण नहीं हो सका| हार-दार कर सुभाष भगत नीरज को डोनेशन देकर बंगलौर के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में बी. टेक में एडमिशन करवा दिए| वह वहां पढ़ने लगा। मेस खर्च और अन्य खर्चों के लिए प्रति माह घर से पैसा जाता था| जब कभी सुभाष भगत को पैसे की तंगी विकास देखता वह फीस का पैसा इंस्टीट्यूट को स्वयम भेज दिया करता था।
विकास जब से नौकरी करने लगा वह हर कदम पर अपने परिवार का साथ देता था।पर्व-त्यौहार के अवसर पर विकास नौकरी पर से जब अपने घर आता तो सभी के लिए कपड़ा एवं मनपसंद चीजें लेकर आता था। पिताजी के लिए उम्दा से उम्दा धोती-कुर्ता एवं मां के लिए भी सुंदर साड़ी लेकर आता था। अन्य लोगों के लिए भी सुंदर-सुंदर उपहार लेकर घर आता। विकास अपना खर्च के लिए कुछ पैसा रखकर वेतन का सारा पैसा अपने पिताजी के हाथ में थमा देता था।
जब नीरज इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था तब जो पैसा उसके खर्च के लिए भेजा जाता, खर्च में कटौती करके उसमें से भी कुछ पैसा बचा लेता था।उसने वहां बैंक में अपना एक खाता भी खुलवा चुका था और उसी में इस पैसा को रखता था।लेकिन वह इस बात की भनक किसी को भी नहीं लगने देता था।
नीरज का कैंपस सलेक्शन हो गया।जब नौकरी करने लगा तब नीरज को जो वेतन मिलता,वह अपने ही पास में रखता था। सुभाष भगत की इच्छा होती कि बड़ा लड़का की तरह वह भी अपना फर्ज निभाए लेकिन दिल के अरमान आंसूओं में बह गए।वह देता क्या, वह तो हमेशा रोता रहता था।कभी बंगलौर में फ्लैट लेनेवाली बात करता तो कभी
वेतन न मिलने के कारण कड़की की बात घर वालों का समझाता था।ऐसी स्थिति में घर से ही कुछ पैसा चला जाता था।
सुभाष भगत के यहां लड़की वाले आने लगे। जिस घर में दो-दो अच्छे पदों पर नौकरी करने वाले सुंदर नौजवान हो उनके घर लड़की वाले का आना लाजिमी था। सुभाष भगत काइंयाँ किस्म के व्यक्ति नहीं थे । उदारता उनके नस-नस में था। जग प्रयोजन में दिल खोलकर खर्च करते थे।
विकास की शादी एक बहुत ही सुंदर और सुशील लड़की से हो गई। शादी में देन-लेन से विकास को कोई मतलब नहीं था। सुभाष भगत को जैसे सुविधा हुआ विकास की शादी-विवाह कर दिए। विकास की पत्नी,सुकन्या,भी विकास की तरह ही सीधी-सादी थी।जैसे विकास कहता उसकी पत्नी उसी तरह घर-परिवार चलाने लगी। सुकन्या सभी का आदर सत्कार करने में माहिर थी।सास, ससुर,देवर के साथ-साथ माँ-बाप से भी सुकन्या का संबंध बहुत अच्छा था।
अगले साल नीरज की भी शादी एक प्रतिष्ठित परिवार में कर दिए।लड़की भी देखने सुनने में अच्छी थी। लेकिन रिंग सेरेमनी सम्पन्न होने के बाद से ही दोनों से रोज बातचीत होने लगी। लड़की का नाम जूली था। वह रोज-रोज शादी में अपनी पसंद की बातें नीरज को बताने लगी। नीरज अपनी मां से अपनी होने वाली पत्नी के बात को बताता था। वह चूड़ी ऐसी चाहती है, साड़ी इस रंग का पसंद है, साडी तथा फ्रॉक शूट दोनों शादी में लेना चाहती है,गहना भी हल्का वजन का नहीं लाने के लिए बोली है,कहती है साड़ी-कपड़ा, गहना-गुड़िया खराब चढ़ाने पर मेरे पापा की जग हंसाई होगी आदि आदि। मां बेचारी बहू की सारी इच्छाओं की पूर्ति अपने पति सुभाष भगत से लड़-लड़कर कर रही थी।हद तो तब हो गई जब नीरज ने मां से बतलाया “ मम्मी,शादी में चढ़ानेवाला गहना जब मैं बंगलौर से आऊंगा तब खरीदना,मैं जुली को भी बुला लूंगा। वह अपने सामने ही चढ़ानेवाला गहना खरीदवाना चाहती है,ऐसा उसने मुझे मोबाइल पर कही है।”
लाढो देवी यह बात सुनकर जल भून गयी।अपने समय की बात उसे याद आने लगी जब लगनौती लड़का-लड़की अपनी शादी-विवाह की बात छुप- छुप कर सुना करते थे। ऐसे कहने की बेशर्मी कहाँ कोई करता था? लाढो देवी मन-मसोसकर अपने सुपुत्र की बात मान ली।लेकिन जब भी नीरज की कोई फरमाइश की बात लाढो देवी अपने पति से कहती,वे बोलते- “ देख लो अपने कलयुगी पुत्र का खेला।”
शादी हंसी-खुशी संपन्न हो गई।जुली ससुराल आई। चौठारी के चार दिन बाद नीरज को बंगलौर जाना था लेकिन सुहागरात के दिन से ही जुली अपने पति संग बंगलौर जाने की जिद पकड़ ली ।शुरू में तो नीरज इस बात को गुप्त रखा लेकिन जुली का रौद्र रूप से डरकर नीरज ने अपने पिता से उसे नौकरी पर ले जाने का फैसला सुनाया। पहले से सुभाष भगत कूढ़े हुए तो थे ही,इस बात से वे और भी bदुखी हो गए लेकिन वे बस इतना ही बोले -”जिसमें तुम अपना भलाई देखो,करो।मेरा कोई रोक-टोक न होगा।”
लाढो देवी को यह बहुत नागवार लग रहा था फिरभी वह अपने पति की बात में टांग अड़ाना नहीं चाहती थी। जब विकास को इस बात की जानकारी मिली तो उसे भी ताजुब्ब हुआ।घर में एक मातम सा छा गया।लेकिन नई बहू से कहे कौन?
हिम्मत जुटाकर बड़की गोतनी सुकन्या मुस्कराकर बोली -”देवरानी जी,सुनी हूं कि देवर साहब आपको नौकरी पर ले जा रहे हैं। कौन सा मंत्र से वशीभूत कर रखीं है मेरे देवर जी को।”
जुली मुंह बिचकाकर बोली-” आपका मखौल मुझे पसंद नहीं है दीदी।”
यह सुनते सुकन्या किनारे पकड़ ली।
सुकन्या देवी ने भगवत कृपा से दो बच्चे को जन्म दी।दोनों बेटा,दोनों जुडवां। विकास चाहता था कि एक बेटी हो और एक बेटा । परंतु उनके आगे कहां किसी का कुछ चलता है? विकास और सुकन्या ने बहुत मंथन के बाद अपने दोनों लाल का नाम रखे ज्ञानेश और अरुणेश। दोनों का जब स्कूली शिक्षा खत्म हुई तब विकास अपने पुत्रों को अपने पसंद की पढ़ाई के लिए खुली आजादी दे दी।
ज्ञानेश ने डॉक्टर बनने की इच्छा जताई और छोटे जनाब इंजीनियर बनना चाहते थे। ज्ञानेश इंटर पास करने बाद डॉक्टरी के प्रवेश के लिए प्रतियोगिता परीक्षा पास की और एम. बी. बी. एस. की पढ़ाई के लिए सी. एम. सी. काटपाडी, चेन्नई चला गया और उसी साल अरुणेश ने भी इंजीनियरिंग कंपटीशन परीक्षा में सम्मिलित हुआ।उसने भी बाजी मार ली। कंप्यूटर विज्ञान में बी. टेक. करने के लिए अरुणेश भी अपना दिल्ली में नामांकन करवा लिया ।
नीरज जुली को लेकर बंगलौर चला गया। वहां दोनों हंसी-खुशी रहने लगे। जुली को भी नीरज ने एक कंपनी में काम लगवा दिया।दोनों पति-पत्नी ऐश-मौज से रहने लगे। जुली गर्भवती हो गई। जब प्रसव का दिन नजदीक आया तो जुली मैटरनिटी लीव लेकर डेरा पर रहने लगी। नीरज ने घर पर फोन लगाया, मां उठाई। उधर से आवाज आई” मम्मी प्रणाम,कैसी हो?” नीरज की आवाज थी। बंगलौर जाने के बाद नीरज पहली दफा कॉल किया था फिरभी मां की ममता उसे पहचान गई।
महीनों के बाद नीरज की आवाज ने उसके अंग-प्रत्यंग में स्फूर्ति जगा दी, पुत्र के प्रति स्नेह की सरिता बहा दी।
“ठीक हूं,बेटा।तुम दोनों कैसे हो ?”
“ठीक हूँ मम्मी,पापा-भैया कैसे हैं?”
“ ठीक हैं। “
“और भाभी?”
“वह भी अच्छी है,वहां बहू का हालचाल कैसा है?”
“बढिया है। वह तुमसे मिलना चाहती है। कहती है मां जी को यहां बुला लीजिए।”
“क्यों,कुछ विशेष बात है?”
“हाँ मम्मी, जुली मां बननेवाली है।”
“बड़ी खुशी की बात सुनाई।बधाई हो। जरूर आऊंगी, तुम्हारे पापा से टिकट कटवाकर मैं जल्द आऊंगी।”
“ पापा से क्यों, मम्मी? मैं टिकट काटकर भेजता हूं।कब का टिकट करवा दें।”
“ उनसे पूछकर बतलाऊंगी।”
“ठीक है,पूछकर बतला देना,बाई।”
मां ने भी “बाई” बोलकर फोन काट दी।
जब लाढो देवी सुभाष भगत को नीरज की पत्नी के पैर भारी होने की बात बताई, उन्हें भी खुशी की अनुभूति हुई, दादा तो पहले से थे ही नये मेहमान के साथ खेलने- खेलाने की अनुभूति से काफी आनंदित हो गए। लेकिन पुत्र की अवसरवादिता को अपनी पत्नी से साझा न किए।
उन्होंने बहू के यहां जाने के लिए हरी झंडी दे दी। लाढो देवी तरह-तरह की चीजें जौर् करने लगी। ये ले जाऊँगी,वो ले जाऊँगी। धरती पर पैर नहीं रखा रही थी। सब सामान बांध-छान्ध कर बंगलोर पहुँच गयी। माँ को लेने नीरज अपनी पत्नी के साथ आया। मां को लेकर अपने डेरा पर चला गया। उस अंजान शहर में दोनों नहीं आते तो माँ बेचारी डेरा तक पहुंचती भी कैसे?
मां के जाने के पन्द्रह दिन बाद ही नीरज की पत्नी ने एक लड़की को जन्म दी । घर में खुशी ही खुशी थी। जब यह खबर सुभाष भगत को मिला। तब वे भी फूले न समाए। कुछ दिन तक दादी अपने नवजात पोती का तेल-कुढ़ की और फिर अपने गांव लौट गई।
अब इलाके में सुभाष भगत की रुतबा और बढ़ गई थी, पूछ भी बढ़ गया था। एक पोता डॉक्टर और एक पोता इंजीनियर बन चुके थे। विकास भगत के बारे में लोग बोलने लगे।यह सब विकास और उसकी पत्नी का पुण्य-प्रताप है। योग्य बाप के योग्य बेटा। बढे पुत्र पिता के धर्मे|
कुछ महीने पहले विकास भगत रिटायर हुए थे। दोनों बेटा की भी शादी-विवाह करके निश्चिंत हो चुके थे।अब उनके दोनों बच्चे उनको हर सुख-सुविधा देने के लिए हमेशा तत्पर रहने लगे। जो माता-पिता की इच्छा होती उसे पूरा करने में दोनों भाई थोड़ा सा भी नाकर-नुकर नहीं करते थे। कई दफ़े भिन्न-भिन्न जगहों की सैर का प्रोग्राम बनता,पूरे फैमिली को सैर कराने ज्ञानेश और अरूणेश लेकर निकल जाते थे। शुरू में दादा-दादी,पापा- मम्मी,चाचा-चाची सभी को ले जाने का प्लान दोनों बनाते थे लेकिन बार-बार चाचा-चाची की अनिच्छा एवं कटाव की भावना से चाचा- चाची को लेकर नहीं जा पाते थे | इस तरह नीरज धीरे-धीरे पापा-मम्मी,भाई-भौजाई और सगे सम्बन्धियों से अलग थलग हो गया, सभी से नाता तोड़ दिया।यहां तक कि किसी कार्य-प्रयोजन में भी घर पर नीरज नहीं आता-जाता था ।
धीरे-धीरे सुभाष भगत काफी थक गए । पचासी पार कर रहे थे| पत्नी के स्वर्गवासी होने के बाद वे और भी टूट गए। कई तरह की बीमारी भी उन्हें दबोच ली थी।विकास भगत पूरे परिवार के साथ अपने पिता की जितनी सेवा हो सकती थी,की। सेवा-सुश्रुषा,दवा-दारू,रुपए-पैसे किसी चीज की कमी नहीं होने देते थे । हर तरह का देखभाल और समुचित खानपान के बाबजूद भगत जी का स्वास्थ्य गिरता चला गया और एक रात सोए-के-सोए रह गए। घर में रोआ-कानी मच गया।
उनकी मृत्यु की खबर नीरज भगत को भी फोन से किया गया लेकिन फोन दस-बीस बार करने के बाद भी नहीं लगा तब पत्राचार के द्वारा खबर किया गया। कोई जवाब नहीं मिला,श्राद्ध कर्म में बंगलौर से कोई नहीं आया। इलाके का सभी लोग दांतों तले अंगुली दबाने लगे।
अब ज्ञानेश एवं अरुणेश का भी कार्य भार बढ़ चुका था। पापा-मम्मी के साथ सैर-सपाटा में जाना दोनों के लिए आसान न रहा।जिम्मेवारियां बढ़ गयी। इसलिए उनके साथ जाना कम हो गया । विकास भगत और उनकी धर्म पत्नी सुकन्या के पास अभी इतना दम-खम था कि वे दोनों तीर्थ यात्रा कर सकते थे।दोनों बेटा उनका हवाई टिकट रेल टिकट,होटल बुकिंग,कैब बुकिंग कर देते थे और दोनों व्यक्ति जहां यात्रा करना चाहते थे, कर लेते थे।
इस बार विकास भगत चार धाम यात्रा पर निकले थे। जब वे हरिद्वार पहुंचे तब वहां गायत्री परिवार में घूमने के लिए गए। वहां गरीबों को मुफ्त खिलाया जा रहा था। सुकन्या की नजर एक बाल्टी में दाल चलानेवाले पर पड़ी। दाढ़ी मूंछें कुछ पकी थी। जीर्ण-शीर्ण शरीर था। यह हाथ नीरज भगत से मिलता जुलता था।सुकन्या ने विकास का हाथ पकड़ कर उस व्यक्ति की ओर ईशारा किया। विकास को भी लगा वही है।लेकिन वह यहां क्यों होगा।विकास भगत बोले -”कोई होगा,चलो आगे बढ़ते हैं।हमलोगों की गलतफहमी है,मेरा भाई यह नहीं हो सकता।कहां इंजीनियर और कहां यह सेवादार।”
जैसे दो कदम वे दोनों आगे बढ़े,उधर से आवाज आई -”भैया।” विकास मुड़कर देखा।आंख से आंख मिली। अनायास विकास के मुँह से निकला- नीरज?
“हां भैया। इतना बोलकर नीरज बगल में दाल की बाल्टी जमीन पर रखकर विकास के चरणों में गिर पड़ा । सुकन्या को भी पैर पकड़ प्रणाम भाभी बोला। दोनों के दोनों चकित थे और नीरज शर्म से तार-तार।
विकास बोला -”यह क्या है? यहां सेवा शौक से कर रहे हो या मजबूरी से।”
“मजबूरी से भैया, मजबूरी से।”
फिर दाल की बाल्टी नीरज उठाने लगा।
विकास ने कहा -”बाल्टी पहले नीचे रख दो।”फिर आगे बढ़कर उसे गले से लगाकर आलिंगन किया। नीरज को हाथ पकड़ अपने होटल में लेकर आया। कमरे में रखे फोन से ऑर्डर दिया-” तीन जगह सैंड बीच और तीन चाय।”
फिर भाभी पूछी-” देवर जी आप यह हाल क्या बना रखा है? “
रो-रोकर नीरज कहने लगा- “ क्या बताऊं भाभी। मेरी किस्मत ही फूटी थी ऐसी कुलटा नारी के पल्ले पड़ गया। जैसे-जैसे मैं उसकी बात को मानता गया वैसे-वैसे वह मुझे अपनी गिरफ्त में लेती गई। मैं तो उस सर्पिणी को उस दिन समझा जिस दिन मां को बुलाने के लिए मुझसे कितनी आरजू मिन्नत की थी।मैं मां को उसकी प्रसव पीड़ा देखकर बुलाया और प्रसव के कुछ दिन बाद से मुझे बुरा भला कहने लगी। माँ उसे काँटा की तरह चुभने लगी। मैंने माँ से कुछ नहीं कहा। मैं चुपके से एक दिन टिकट कटाकर मां को भेज दिया था।”
उसने आगे कहा -”जिस पैसा को बचाने के खातिर मैंने क्या नहीं किया।पापा-मम्मी से छल किया,भैया-भाभी से झूठ बोला,सिर्फ और सिर्फ अपना स्वार्थ देखा,उसी पैसा को लेकर जुली मुझे छोड़कर कहां चली गई,कोई अता पता नहीं।मैने उसके और उसके मां बाप के बहकावे में आकर क्या नहीं किया। आप सभी से झगड़ा-झंझट किया,पापा से जबरदस्ती बाँट-बंटवारा किया,भैया के समझाने के बाबजूद मैने अपने हिस्सा की पूरी संपति बेचकर उसके कहने पर उसके नाम से सारी संपति फ़्लैट,जमीन खरीद कर सुखी और सुंदर भविष्य की कल्पना की थी लेकिन सब कुछ मिटीयामेट हो गया।”
नीरज भगत सुबक-सुबक रो रहा था और बोल भी रहा था। भैया भी टुकुर–टुकुर नीरज को देखते हुए उसके दर्दभरे व्याख्यान सुन रहे थे।विकास तथा सुकन्या भी नीरज की बात से बहुत व्यथित हो रहे थे।
विकास भगत नीरज को टोका-” तब तुम यहां कैसे आए? वहां का फ्लैट जमीन इत्यादि?”
“भैया आपके सामने यह सब बताने में शर्म से गल रहा हूं फिर भी मैं अपनी मूर्खताभरी दास्तां किसे सुनाऊं? एक बार मैं जब दूसरे जॉब की तलाश में पुणे आया तब यहां कुछ दिन रहना पड़ा। किस्मत फूटी थी,नौकरी नहीं लगी,लौटकर बंगलौर गया,फ्लैट में ताला बंद मिला। अगल-बगल वालों से पता चला जुली फ्लैट को किसी के हाथों बेचकर किसी अन्य शहर में बेटी के साथ चली गई है।ससुराल में पता लगाया,वहां भी नहीं थी।ससुरालवालों ने कहा तुम्हीं अपनी पत्नी और बच्चे को गायब कर नया चाल चल रहे हो। तुम पर मुकदमा दायर करेंगे। मुझे उस समय दुनिया क्या है,कैसी है,आभास हुआ।मैं दुनियादारी की दुनिया से निकलकर सेवादारी की दुनिया अपना लिया । तबसे मैं यहीं हूँ।अब मैं किसी का न रहा और न अब मेरा कोई रहा।”
विकास ने कहा -”नहीं भाई, हमलोग अभी भी तुम्हारे साथ खड़े हैं।चलो मेरे साथ एक नई दुनिया बनाने,एक नई दुनिया बसाने।”
चारों धाम की यात्रा करके विकास भगत लौटे तब उनके साथ सुकन्या देवी के साथ- साथ नीरज भगत भी थे।

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