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4 May 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . वक्त

दोहा पंचक. . . . वक्त

मानव को देता सदा, वक्त यही संकेत ।
मेरे मौन प्रहार से, रहना सदा सचेत । ।

वक्त मौन फिर भी भरे, बड़ी अजब हुंकार ।
इसके आगे आदमी, लगे सदा लाचार ।।

डर कर रहना वक्त से, इसका अजब मिजाज ।
इसकी लाठी तो सदा, होती बे-आवाज ।।

बाँधी किसने वक्त के, पैरों में जंजीर ।
चलना अपनी चाल से, इसकी है तासीर ।।

अलग- अलग हैं वक्त के, हर जीवन में रंग ।
अवसर के अनुरूप ही, इसके होते ढंग ।।

सुशील सरना /4-5-25

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