*चाहत*
चाहत
एक मुद्दत से चाहत भरी तमन्ना थी,
कभी तुम हमें पसंद करो, कभी हम आपको पसंद करेंगे।
कभी मन में खुशी, कभी किसी बात का ग़म कभी साथ बैठे गुमसुम से, कभी दो कदम साथ चल प्रीत की रीत निभायेंगे।
कभी अजनबी की तरह से ,जैसे मिले ही ना हो कभी ऐसे दूर से देख चले जायेंगे।
शर्त तो यही था कि साथ दूर बैठे हुए भी, नजरों से बातें समझ जाएंगे।
पास ना बैठे हो फिर भी दूर से वादा पूरा निभायेंगे।
ये कैसा रिश्ता है जो उम्र के पडाव में, कुछ अच्छे-बुरे नए उमंगों से खुश हो जाएंगे।
दूरियाँ ही सही, मगर कभी पास आके भी, मजबूत रिश्ते बनाएंगे।
बढ़ती हुई उम्र का तकादा बहाना बना के फिर से नई मुलाकातों का सिलसिला बढ़ाएंगे।
यूँ ही मुलाकातें होगी उम्र गुजरते हुए, कभी पास कभी दूरियों में खुशियां मनाएंगे।
आवाज देके जब भी पुकारें तो सुन पाओगे, मन को हम समझाते ही रह जाएंगे।
कभी दूर से हल्की सी मुस्कान चेहरे पे देके, तुम्हारी अदाओं पे हम और निखर जाएंगे।
यही अदाएं भा गई हमको, आँखों में उतर के दिल में प्यारा सा अरमान ले बिफर जाएँगे।
हमसफर साथ हो, पुरानी बातें यादगार हो, जिंदगी के हसीन लम्हों में हम तुम खो ही जाएँगे ।
शशि कला व्यास शिल्पी