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3 May 2025 · 1 min read

*मनः संवाद----*

मनः संवाद—-
03/05/2025

मन दण्डक — नव प्रस्तारित मात्रिक (38 मात्रा)
यति– (14,13,11) पदांत– Sl

जो होता है मित्र वही, समय बदलते ही बने, लगता कोई गैर।
जाकर चुगली करे कहीं, भेद सभी वह जानता, रखता मन में बैर।।
जिसको दिल में सदा रखा, संरक्षण जिनको दिया, वहीं दबाता पैर।
पर इसकी परवाह नहीं, अपना हिम्मत हार मत, पार निकलना तैर।।

नहीं परायों से डरना, अपनों से डरकर रहो, यही जानते भेद।
कब कितना कैसे जग में, खोया पाया है किसे, कहाँ बहाया स्वेद।।
मत विश्वास कभी करना, छुपे हुए है शत्रु भी, करते थाली छेद।
दूरी कुछ तो बनी रहे, घनिष्ठता अच्छी नहीं, कहता अपना वेद।

— डॉ. रामनाथ साहू “ननकी”
संस्थापक, छंदाचार्य, (बिलासा छंद महालय, छत्तीसगढ़)
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