बाल कविता
यदि होते पंख हमारे
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यदि होते पंख हमारे,
हम भी तो फिर उड़ पाते।
सैर सपाटा सब कर लेते,
घूम-घाम फिर घर आते।।
गली-गली और खेत बाग वन,
घूम-घूम जब थक जाते।
बैठ पेड़ की किसी डाल पर,
तोड़ मधुर फल तब खाते।।
उड़कर जाते नील गगन में,
तारों से भी हम मिल पाते।
खूब खेलते संग में उनके,
चन्दा मामा के भी घर जाते।।
बने पखेरू उड़ते फिरते,
चिड़ियों से भी रेस लगाते।
दूर पहाड़ों में जाकर के,
झरनों में फिर खूब नहाते।।
~राजकुमार पाल (राज) ✍🏻
(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)