जी रहा हूँ मैं यहाँ,ख्वाब क्या मन में लिये
जी रहा हूँ मैं यहाँ, ख्वाब क्या मन में लिये।
किसकी खुशियों के लिए, ख्वाब किसका दिल में लिये।।
जी रहा हूँ मैं यहाँ———————————।।
जबकि यहाँ मुझसे वफ़ा, कोई किसी ने नहीं की।
जिससे की मोहब्बत मैंने, उसने मोहब्बत नहीं की।।
कर रहा हूँ मैं मोहब्बत, उससे क्यों किसके लिये।
जी रहा हूँ मैं यहाँ—————————-।।
किया विश्वास जिस पर, हो गया पल में जुदा वह।
माना जिसको दोस्त मैंने, चला गया होकर खफा वह।।
कर रहा हूँ इंतजार उसका, उससे क्या उम्मीद लिये।
जी रहा हूँ मैं यहाँ———————————।।
रोज ईश्वर से दुहायें, मांगता हूँ मैं यही।
खुश सदा उसको रखें, चाहे वह रहे कहीं।।
देख रहा हूँ मैं राह, किसकी आने के लिए।
जी रहा हूँ मैं यहाँ————————-।।
यह जो तस्वीर मैंने, यहाँ बनाई है जिसकी।
यह जो मूरत मैंने, यहाँ लगाई है जिसकी।।
लिख रहा हूँ यह कहानी, कल की क्यों किसलिए।
जी रहा हूँ मैं यहाँ—————————।।
शिक्षक एवं साहित्यकार
गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)