कायर हमला
कायर हमला
सखी छंद 14
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दहशत में हा हा करती।
वह पहलगांव की धरती।।
क्षण भर भी सोच न पाई ।
यों कालघटा मॅंडराई ।।
बेबस बेचारा बलमा।
जब सुना न पाया कलमा।
अवरुद्ध कंठ की बोली।
चल गई शीश पर गोली।
कर सके कलम न लेखा।
शौहर जब मरते देखा।
पल पर हर पल था भारी।
रो भी न सकी तब नारी।।
थी नई नई सिंदूरी।
मन की सब आस अधूरी।
यह पहलगांव की माटी ।
बन गई नर्क की घाटी।।
मॅंहदी माहुर की लाली।
ज्यों रोम रोम खुश हाली।।
पति संग घूमने आई।
यह सजा मौत की पाई।
उजड़ा सिंदूर सदा को।
आतंक डसा अबला को।
अविरल आ़ॅंसू की धारा।
माॅंझी बिन कहाॅं किनारा।
हत्यारे पाकिस्तानी ।
निर्मम मुस्लिम रमजानी।
घुस गये देश में कैसे?
हम रहे देखते ऐसे।
बदला लें हर आ़ॅंसू का।
मारें बन जाय बिजूका।
खोलें बारूदी बक्शा।
मिट जाय पाक का नक्शा।।
अब नहीं शायरी होवे।
दिल खोल फायरी होवे।।
जो लिया हिंद से पंगा।
लहराये पाक तिरंगा।।
गुरु सक्सेना
2/5/25