पसीने से सींचा संसार,पर खुद क्यों सूखा रह गया बिहार(बिहार की अनसुनी पीड़ा): अभिलेश श्रीभारती
जब भी देश में सस्ता श्रम, कठिन परिश्रम या “हर हाल में काम कर जाएगा” जैसी बातें होती हैं, तो सबसे पहले ज़हन में एक ही नाम आता है – बिहार। इस राज्य ने न जाने कितने मजदूर दिए हैं इस देश को। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और लेह से लेकर लक्षद्वीप तक,कोई कोना ऐसा नहीं बचा होगा जहां बिहारी मजदूर की काली हथेलियों से ईंट न उठी हो, जहां उनकी पसीने की बूंदें ज़मीन पर न गिरी हों।
मुंबई की ऊंची-ऊंची इमारतें जिनकी खूबसूरती दुनिया भर को आकर्षित करती है, वो किसी आर्किटेक्ट के कंप्यूटर से नहीं, बल्कि किसी बिहारी मजदूर की मेहनत से खड़ी हुई हैं। पंजाब की लहराती फसलें, जो पूरे देश का पेट भरती हैं, उनके पीछे किसी हरियाणवी और पंजाब के किसानों से ज्यादा योगदान उस बिहारी मज़दूर का है जो सर्दी-गर्मी की परवाह किए बिना खेतों में झुककर काम करता है।
तो आज इस मजदूर दिवस पर एक लेखक के तौर पर बिहार की राजनीति पार्टियों से मेरा सवाल क्आखिर क्यों बिहार केवल मजदूरों की फैक्ट्री बनकर रह गया है? या फिर बना दिया गया?
एक बिहारी होने के नाते जब मैं यहीं सवाल यहां के राजनीतिक पार्टियों से करता हूं तो राजनीतिक पार्टी और उनके चमचे मेरे सवाल के उत्तर देने बजाय मुझे ही तर्क-वितर्क समझाने लग जाते हैं।
तथाकथित तौर पर कहा जाता है कि बिहार पूरी तरीके से लैंडलॉक राज्य है और दूसरी प्राकृतिक आपदाएं यहां के विकास की सबसे बड़ी बाधा है।
तो बताइए साहब इस बाधा को कौन दूर करेगा?
बिहार में संसाधनों की कमी नहीं है। माइका, जल, भूमि – सब कुछ है। लेकिन योजनाओं की कब्रगाह बन चुकी सरकारें, राजनेताओं का अवसरवाद और स्थानीय उद्योगों का अभाव ऐसा ज़हर है जिसने इस राज्य को बस एक ‘श्रम आपूर्ति केंद्र’ बना दिया है। इसलिए बिहार में प्रतिदिन सैकड़ों ट्रेनों से करोड़ों की संख्या में प्रतिदिन मजदूरों को भेजी जाती है और इसकी अनुभव अपने तब क्या होगा। जब बिहार से निकलने वाली ट्रेन में आप सफर किए होंगे उसमें पैर रखने तक की जगह नहीं होते हैं। खासकर जनरल और स्लीपर बोगी में
अब आप ही बताइए? कि
छह हज़ार की नौकरी के लिए हजारों किलोमीटर दूर जाना किसे अच्छा लगता है?
बिहारी अपनी मर्जी से परदेस नहीं जाता, हालात उसे मजबूर करते हैं। कभी बच्चों का पेट भरने, कभी बूढ़े मां-बाप की दवा के लिए। परदेश जाकर वो अपमान भी सहता है, अपना पहचान भी खो देता है। कहीं उसे ‘बिहारी’ कहकर नीचा दिखाया जाता है, कहीं उसे स्थानीय रोजगार के दुश्मन की तरह देखा जाता है। पर क्या कभी किसी ने पूछा कि वो अपना घर क्यों छोड़ रहा है?
सबसे दुखद बात ये है कि अपने आंखों से यह सब देखते हुए खुद बिहार की ममता भी रो पड़ती है लेकिन फिर भी बिहार के नेताओं को फर्क नहीं पड़ता। उससे तो बस वोट बैंक की रोटी सीखने के लिए मासूम बिहारी की भावनाओं की आग चाहिए।।
बिहारियों ने अब मान लिया है कि यही उनकी नियति है। उन्हें मज़दूरी करनी है, सहना है, झेलना है – और चुप रहना है। शायद ही कोई नेता हो जो मजदूरों की इस समस्या को लेकर मुखर हो। याद कीजिए जब देश कोरोना की महामारी से लड़ रहा था, तो सबसे लंबी यात्रा किसी और की नहीं, बिहारी मजदूरों की थी – नंगे पाँव, भूखे पेट, सैकड़ों किलोमीटर की।
और इस लंबी यात्रा में मैं भी सम्मिलित था। उत्तर प्रदेश की मुरादाबाद से लेकर बिहार के दरभंगा तक कई दिनों तक हमारी यात्रा थी।
हमारे लिए कोई आंदोलन नहीं होता, कोई पोस्टर नहीं बनता, कोई मोर्चा नहीं निकलता।
हम वो हैं जो हर बार चुपचाप अपना सामान उठाते हैं, ट्रेन पकड़ते हैं और फिर किसी दूसरे शहर में झुग्गी बना लेते हैं – ताकि वहां के सपनों को हम साकार कर सकें, खुद अपने सपने गाड़कर।
आज बिहार की ममता रोते हुए चीख रही है…
की बिहार को मजदूरों की फैक्ट्री न बनाइए।
यहां भी प्रतिभा है, क्षमता है, मेहनत है। बस ज़रूरत है नीति की, नेतृत्व की, और एक जन-चेतना की जो कहे – अब और नहीं। अब बिहार के युवा सिर्फ बोझ उठाने के लिए नहीं, नेतृत्व करने के लिए निकलेंगे।
यह सवाल आज मज़दूर दिवस पर हम सबको खुद से पूछना चाहिए –आखिर कब तक ‘बिहारी’ अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना रहेगा?
अपने ही देश में इस प्रकार के दोयम दर्जे को देखकर कभी-कभी दर्द इतना गहराता है कि आवाज़ नहीं उठती, बस एक भारी सन्नाटा उतर आता है। आज, मज़दूर दिवस पर वही सन्नाटा है – एक बिहारी के हिस्से का सन्नाटा।
जिसे शायद ही कोई महसूस कर सकता है एक परदेसी बिहारी होने के नाते मैने इस सन्नाटा को जिया और अनुभव किया है। देश की कई सारे राज्यों में मैंने सन्नाटा भरी इस चुप्पी को महसूस किया है।
क्या कहें अब?
सालों से सुनते आ रहे हैं – “बिहारी तो मेहनती होते हैं”, “हर जगह मिल जाते हैं”, “सस्ते में काम कर लेते हैं”।
शायद हम मेहनती हैं… या शायद मजबूर।
यह पीड़ा तो केवल हम ही जानते हैं और सामने वाले को हमारे इस पीड़ा से कोई मतलब नहीं होता और अब इसमें फर्क करने में भी हम कोई मायने नहीं रखते
हमने हर ईंट पर पसीना बहाया, हर खेत में मेहनत की, हर शहर में खुद को मिटाया – फिर भी पहचान क्या है? बस ‘बिहारी मजदूर’।
बिहार… एक ऐसा राज्य जो खुद में श्रम ऊर्जा का भंडार है, लेकिन उसकी नसों से शक्ति चूसकर बाकी राज्य चमकते रहे। हम वहीं के वहीं रहे। आखिर क्यों? क्यों? क्यों?
सवाल कौन क्या करेगा या कोई कुछ नहीं करेगा।
क्यूंकि सरकारें बदलती रहीं, नीतियाँ बनती रहीं, घोषणाएँ होती रहीं – लेकिन बिहार में कुछ नहीं बदला।
और अब हम बदलाव की उम्मीद करना भी छोड़ चुके हैं।
अब हमारे परिवार भी नहीं पूछते कि “बोलो, घर कब आओगे?”,
क्योंकि उन्हें भी पता है – हम घर नहीं, परदेस के लिए बने हैं।
हम अब शिकायत नहीं करते।
हमें आदत हो चुकी है झुग्गी की, तिरस्कार की, “बिहारी” कहकर हँसी उड़ाने की।
हम अब प्रतिक्रिया नहीं देते – हम बस सहते हैं।
कभी वक्त मिले तो अवश्य सोचिएगा:
जो राज्य पूरे देश की नींव रखता है, उसका खुद का घर क्यों खंडहर है?
लेकिन अब कोई गुस्सा नहीं है, कोई अपेक्षा नहीं है।
बस एक चुप्पी है, और चुप्पी सी एक स्वीकार –
कि हम इस देश के मेहनती नागरिक हैं,
पर शायद पहले दर्जे के नहीं।
और शायद कभी होंगे भी नहीं।
✍️आलेख साभार✍️
—अभिलेश श्रीभारती (एक परदेशी)
सामाजिक शोधकर्ता, विश्लेषक, लेखक