मर्यादा हो पूंजीपतियों की।
मर्यादा हो पूंजीपतियों की।
धर्मगुरु बनें करुणा की वीथी।।
आदर्शों को फिर गढ़ सकते हैं।
नवयुग की ज्योति मढ़ सकते हैं।।
-आचार्य शीलक राम
मर्यादा हो पूंजीपतियों की।
धर्मगुरु बनें करुणा की वीथी।।
आदर्शों को फिर गढ़ सकते हैं।
नवयुग की ज्योति मढ़ सकते हैं।।
-आचार्य शीलक राम