काना फूसी
आंख मूंद कर बैठना,
है बुज़दिल का काम।
करना है झटपट करो,
माफ करें ना राम।।१.
खून के आंसु पोंछ दें,
चल हट चुप्पी तोड़।
साबित कर तू शेर दिल,
वरना कुर्सी छोड़।।२.
मातम पसरा देख ले,
बिलख रहा है देश।
करनी तू करता नहीं,
कटबा दे सब केश।।३.
रात कह रही भोर से,
छुपकर जा कहिं बैठ।
तमस भरा आतंक है,
बुरा वक्त है ठैट।।४.
तीर तमंचे रो रहे,
अकुलाते है रोज।
कोई तो अब जतन कर,
कोइ तो युक्ति खोज।।५
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कवि- गजानंद डिगोनिया ‘जिज्ञासु’