कभी-कभी दर्द इतना गहराता है कि आवाज़ नहीं उठती, बस एक भारी स
कभी-कभी दर्द इतना गहराता है कि आवाज़ नहीं उठती, बस एक भारी सन्नाटा उतर आता है। आज, मज़दूर दिवस पर वही सन्नाटा है – एक बिहारी के हिस्से का सन्नाटा।
सरकारें बदलती रहीं, नीतियाँ बनती रहीं, घोषणाएँ होती रहीं – लेकिन कुछ नहीं बदला।
हम अब उम्मीद करना छोड़ चुके हैं।
—अभिलेश श्रीभारती