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1 May 2025 · 1 min read

ख़तों में भर कर एहसासों को अपने

ख़तों में भर कर एहसासों को अपने
रात की उन्नीद पलकों से बुहारा होगा,

किसी दरख़्त में पड़कर सिसकते रूह ने
कतरा-कतरा हर लब्ज़ को पुकारा होगा।

न जाने कौन से दराज़ में अटके हुए होंगे
तुम्हारे ख़त मगर…… कह दो!
कि अब मिलन फिर तुमसे दुबारा होगा।

शुभम आनंद मनमीत

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