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1 May 2025 · 5 min read

■ #अंतर्राष्ट्रीय_श्रम_दिवस (01 मई)

■ #अंतर्राष्ट्रीय_श्रम_दिवस (01 मई)
★ दिवस विशेष पर सहालगी व तनावी माहौल हावी
★ श्रमिकों को बनी रहेगी दो जून की रोटी की तलाश
【प्रणय प्रभात】
“मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या?
अगणित बार धरा पर मैने स्वर्ग बसाए।”
ख्यातनाम कवि देवराज “दिनेश” द्वारा रचित उक्त कालजयी पंक्तियों के आधार श्रमिक समाज की महत्ता और भूमिका को रेखांकित करने वाला अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर (श्रमिक) दिवस आज 01 मई को मनाया जा रहा है। यह वही दिन है जो पूंजीपतियों को सर्वहारा व असंगठित श्रमिक समुदाय की उपादेयता से परिचित कराता रहा है और श्रमिक समाज को अपने अधिकारों की समझ के लिए प्रेरित भी करता आया है। उन श्रमिकों को, जिनकी भूमिका किसी एक दिन की मोहताज़ नहीं। यह और बात है कि बीते दशक में इन धारणाओं में बहुत बदलाव आया है। मज़दूर समर्थ व सक्षम भले ही हो हुआ हो, प्रेरित व संगठित नहीं हो पाया है।
साल-दर-साल देश-दुनिया में मनाए जाने वाले इस दिवस विशेष के मायने दुनिया भर के श्रमिक संगठनों के लिए भले ही जो भी हों लेकिन सच्चाई यह है कि भारत और उसके सूबों में मांगलिक आयोजनों के बूझ-अबूझ मुहूर्त के निर्बाध दौर में पूर्व तैयारियों के आपा-धापी भरे माहौल और बिहार, महाराष्ट्र व पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव सहित एक नरसंहार के बाद सीमाओं पर तनाव के परिप्रेक्ष्य में जारी सियासी धमाचौकड़ी ने मज़दूर दिवस के परिदृश्यों को पूरी तरह से हाशिए पर ला कर रख दिया है। हालांकि मुफ़्त के 5 किलो राशन और “आपदा में अवसर” जैसे मंत्र की प्रेरणा से दो वर्गों में बंटे श्रमिकों को दिवस विशेष के कार्यक्रमों से आज भी कोई लेना देना नहीं, तथापि एक चिंतनीय प्रश्न अवश्य है कि रोज़ी रोटी की जंग व आर्थिक मारामारी के दौर में सर्वहारा समुदाय को सिस्टम किस दिशा की ओर ले जा रहा है?
एक तरफ कौशल विकास, आर्थिक उन्नयन, उदारीकरण व विभिन्न योजनाओं ने श्रमिकों को विकास व समाज की मुख्यधारा की ओर अग्रसर किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मुफ़्त के राशन व रेवड़ी कल्चर ने एक बड़े वर्ग को आरामतलब, व्यसनी व अकर्मण्य बनाने का अपराध भी किया है। तीसरा पहलू वैज्ञानिक व तकनीकी विकास की गति की देन मशीनीकरण है, जो श्रम जगत की आजीविका के असंख्य अवसरों को लीलने पर आमादा है। इसे श्रमिक समुदाय के लिए एक भावी संकट कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। वैसे एक नज़रिए से यह पूरी तरह ग़लत भी नहीं है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। श्रम अधिक मंहगा, दुर्लभ, लोभी व अड़ियल होगा, तो मशीनें विकल्प बनेंगी ही। ठीक वैसे ही, जैसे अति मुनाफे के कारोबार का विकल्प ऑनलाइन व्यापार बन चुका है।
बीते कल की तरह आज व कल बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाले वैवाहिक, राजनैतिक व अन्यान्य कार्यक्रमों और सामूहिक विवाह सम्मेलनों की अग्रिम व्यवस्थाओं की चहल-पहल ने अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को उन परम्परागत आयोजनों और गतिविधियों से लगभग दूर करना पहले ही तय कर दिया था, जो महज औपचारिकता साबित होने के बावजूद श्रमिक समुदाय को कुछ हद तक गौरवान्वित ज़रूर करते थे। इनमें छुटपुट कार्यक्रमों और थोथी भाषणबाज़ी की चर्चा शामिल नहीं। सियासी व कारोबारी कोलाहल में दबे वास्तविक मज़दूरों के स्वर इस बार वातावरण में उभर पाऐंगे इस बात के आसार बेहद क्षीण बने हुए हैं, क्योंकि उनके हितों व अधिकारों की दुहाई देने वाले शासन-प्रशासन और उनके प्रतिनिधियों की ओर से इस दिवस विशेष को बीते वर्षों में भी कोई ख़ास तवज्जो कभी नहीं दी गई थी। रही-सही कसर आसमान से बरस रही आपदा और जलती हवा के धूल भरे थपेड़ों ने पूरी कर दी है। जिसने लोगों को नया निर्माण काम शुरू कराने से भी रोक रखा है और श्रमिक समुदाय को सामान्य ऊर्जा की कमी और रोग-प्रकोप के साथ झोंपड़ियों तक समेट दिया है। यह दौर मानसूनी दौर तक चलना लगभग तय है।
कुल मिला कर श्रमिक समाज आज भी रोज़ कमा कर रोज़ खाने की बीमारी से निजात पाता नज़र नहीं आ रहा। जो आज भी आम दिनों की तरह अपनी भूमिका का निर्वाह दिहाड़ी मज़दूर के रूप में करेगा। जिनका प्रमाण तामझामों के बीच पूरी शानो-शौकत से निकलने वाली बारातों, रैलियों व कवायदों से लेकर भव्य भोज के आयोजनों तक में श्रमसाधना के रूप में नज़र आएगा। वैसे भी
हाड़-मांस की देह अभी तक दिहाड़ी पर ही टिकी हुई है। सैकड़ों जुमलों, वादों व दावों के बावजूद।
श्रमजीवी समाज आज अपने लिए मुकर्रर एक दिवस-विशेष को भी चैन से बैठा नज़र आने वाला नहीं है। फिर चाहे वो विभिन्न शासकीय-अशासकीय योजनाओं के तहत ठेकेदारों के निर्देशन में निर्माण स्थलों पर चल रही प्रक्रिया हो या जिला मुख्यालय से लेकर ग्राम्यांचल, वनांचल तक जारी मांगलिक आयोजनों की मोदमयी व्यस्तता। हर दिन रोज़ी-रोटी के जुगाड़ में बासी रोटी की पोटली पुड़िया में बंद नमक, मिर्च और प्याज के साथ लेकर घरों से निकलने और देर शाम दो जून की रोटी का इंतज़ाम कर घर लौटने वाले श्रमिक समाज को आज भी सुबह से शाम तक हाड़-तोड़ मेहनत मशक़्क़त में लगा देखा जा सकेगा। भीड़ भरे यात्री वाहनों में पूरा किराया अदा करने के बाद भी खड़े होकर यात्रा करते हुए पाया जा सकेगा। मज़दूर दिवस क्या होता है, इस सवाल के जवाब का तो शायद अब कोई औचित्य ही बाक़ी नहीं बचा है, क्योंकि बीते हुए तमाम दशकों में इस दिवस और इससे जुड़े मुद्दों को लेकर ना तो मज़दूरों में कोई जागरूकता आ सकी है और ना ही लाने का प्रयास गंभीरता व ईमानदारी से किया जा सका है। ऐसे में उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति शायद नामचीन शायर मरहूम जनाब राही शहाबी साहब की इन चार पंक्तियों से ही मुमकिन हो सकती है:-
“हम हैं मज़दूर हमें कौन सहारा देगा?
हम तो मिटकर भी सहारा नहीं मांगा करते।
हम चराग़ों के लिए अपना लहू देते हैं,
हम चराग़ों से उजाला नहीं मांगा करते।।”
बहरहाल, मेरी वैयक्तिक कृतज्ञता व शुभेच्छा उन अनगिनत व संगठित-असंगठित श्रमजीवी, ईमानदार व स्वाभिमानी श्रमिकों के लिए, जिनकी दिल्ली कल भी दूर थी, आज भी दूर है और कल भी नज़दीक़ आने वाली नहीं। हां, चुनावी साल में सौगात के नाम पर थोड़ी-बहुत ख़ैरात देने का दावा, वादा या प्रसार-प्रचार ज़रूर किया जा सकता है। जो सियासी चाल व पाखंड से अधिक कुछ नहीं। उम्मीद की जानी चाहिए कि धरती के विश्वकर्माओं को तंत्र नाम से नहीं काम, दाम व सम्मान से भी विश्वकर्मा बना रहने देगा।।
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●संपादक●
न्यूज़ & व्यूज़
(मध्यप्रदेश)

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