बाल कविता
श्रमिक दिवस
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बड़े-बड़े जो महल बनाता,
बिन छत रहने को मजबूर।
दिन भर कठिन परिश्रम करता,
ऐसा होता है मजदूर।।
रोज निकलता इस आशा से,
जो कुछ आज कमाऐगा।
अपने बच्चों के साथ बैठकर,
दो रोटी खा पाएगा।।
एक मई को दिवस मनाना,
क्या इतना ही काफी है।
उसकी इस हालात के खातिर,
कहाॅं कौन सी माफी है।।
कर्ज बोझ हो जिसके सिर पर,
समय-समय पर हो रोता।
पेट भरा हो जिस दिन ढंग से,
वही दिवस उसका होता।।
~राजकुमार पाल (राज) ✍🏻
(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)