*मनः संवाद----*
मनः संवाद—-
01/05/2025
मन दण्डक — नव प्रस्तारित मात्रिक (38 मात्रा)
यति– (14,13,11) पदांत– Sl
यात्राएँ बहुत थकाती, चाहे जो साधन रहे, थककर होता चूर।
अगर कार्य फल फलित हुआ, होता मन संतोष है, देख लिए कुछ हूर।।
जहाँ उद्देश्यों की सीमा, जब होती है पूर्णता, मिले खुशी भरपूर।
वापस आने पर लगता, यात्रा अब की है सफल, पास रहे या दूर।।
जाने कब से यात्रा में हूँ, निश्चित कोई खोज है, लेकिन अभी अपूर्ण।
जिसको छूकर अपनाता, बस थोड़ी ही देर में, सपने होते चूर्ण।।
अब भी जारी है यात्रा, पूरी होगी कल्पना, और अधिक उद्गूर्ण।
जब हर्षित होगा यह मन, एक झलक की आस है, और नहीं अवघूर्ण।।
रेंगत रेंगत दिन ढलते, जागत बीते रात हर, मन रइथे बेचैन।
अड़बड़ दूरिहा मयारू, तोर गाँव के वो ठिहा, कैसे देखे नैन।।
हाथ गोड़ बँधना परगे, जटके जियरा तोर सो, जइसे चोपी मैन।
कोन गली मा भेट करौं, सबो धरे हे मोर बर, विरहा के दिन रैन।।
— डॉ. रामनाथ साहू “ननकी”
संस्थापक, छंदाचार्य, (बिलासा छंद महालय, छत्तीसगढ़)
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